कोई, तो दरिया उतर जाए मेरे सीने मे

कोई,
तो दरिया उतर जाए
मेरे सीने मे
कि आग ही आग लगी है
मेरे सीने मे
लहरों से
नज़्म लिख दूँगा
यदि कोई चांद
उतर आए मेरे सीने मे
ता उम्र
मुरझाने न दूँगा
यदि कोई फूल
खिल जाए, मेरे सीने मे
ग़र
कोइ आ के टटोले
तो हजार ज़ख्म
मिल जायेंगे मेरे सीने मे
सुनोगे तो
उदास हो जाओगे, तुम भी
लिहाज़ा मेरे ग़मो को
दफ़न ही रहने दे मेरे सीने में
मुकेश इलाहाबादी ----

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