हर इंसान अपने भीतर एक अधबना मकान लिए चलता है।

 अब मुझे लगता है

हर इंसान अपने भीतर

एक अधबना मकान लिए चलता है।


कहीं दीवारें बिना पलस्तर की,

कहीं खिड़कियाँ बिना शीशों के,

कहीं कोई कमरा

बरसों से बंद।


और हम

उम्र भर दूसरों को

बैठक दिखाते रहते हैं।


कभी-कभी

कोई अचानक

उस बंद कमरे का दरवाज़ा छू लेता है —

बस वहीं से

आवाज़ बदल जाती है आदमी की।


समय का काम

शायद बूढ़ा करना नहीं,

धीरे-धीरे भीतर की आवाज़ें कम करना है।


एक उम्र के बाद

ख़ुशी भी

ज़ोर से नहीं हँसती।

वह बस

कुर्सी खींचकर थोड़ी देर पास बैठ जाती है।


और दुख?


वह अब आँसुओं में नहीं आता।

वह आता है

जैसे अलमारी में रखे कपड़ों पर

धीरे-धीरे उतरती सीलन।


पहले दिखाई नहीं देता,

फिर एक दिन

पूरी गंध बदल देता है।


मैंने यह भी देखा है

कि इंसान

सब कुछ भूल सकता है,

मगर अपनी प्रतीक्षा का स्वभाव नहीं भूलता।


कोई प्रेम की प्रतीक्षा करता है,

कोई क्षमा की,

कोई एक आख़िरी बातचीत की।


और कुछ लोग

सिर्फ़ इस बात की प्रतीक्षा करते हैं

कि एक दिन

उनके भीतर का शोर

पूरी तरह शांत हो जाए।


मुकेश ,,,,,,,

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