या अर्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्...” — पृथ्वी सूक्त के अष्टम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
या अर्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्...” — पृथ्वी सूक्त के अष्टम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
पृथ्वी सूक्त का अष्टम मंत्र सम्पूर्ण सूक्त के सर्वाधिक गूढ़ और दार्शनिक मंत्रों में से एक है। यहाँ ऋषि पृथ्वी के वर्तमान स्वरूप का नहीं, बल्कि उसके आदिम अस्तित्व, उसके रहस्य, उसके अन्तरतम सत्य तथा उसके द्वारा राष्ट्र को प्रदान की जाने वाली शक्ति का वर्णन करते हैं। इस मंत्र में सृष्टिविज्ञान (Cosmology), दर्शन, भूविज्ञान और राष्ट्रचिन्तन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
आधुनिक विज्ञान पृथ्वी की उत्पत्ति को लगभग 4.54 अरब वर्ष पूर्व की घटना मानता है। वैदिक ऋषि वैज्ञानिक भाषा का प्रयोग नहीं करते, किन्तु वे सृष्टि के आदिम जल, ब्रह्माण्डीय रहस्य और पृथ्वी के अन्तर्निहित सत्य की चर्चा करते हैं। इसलिए यह मंत्र विशेष रूप से वैज्ञानिक और दार्शनिक अध्ययन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
मंत्र-पाठ
या अर्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्,यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।यस्या हृदयं परमे व्योमन्,सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।सा नो भूमिस्त्विषिं बलं,राष्ट्रे दधातूत्तमे॥ ८॥
जो पृथ्वी आदिकाल में जलराशि के मध्य स्थित थी, जिसका मनीषियों ने अपने ज्ञान द्वारा अन्वेषण किया; जिसका अमर हृदय परम आकाश में सत्य से आवृत है—वह पृथ्वी हमारे श्रेष्ठ राष्ट्र में तेज, शक्ति और सामर्थ्य स्थापित करे।
आदिम जल और सृष्टि की उत्पत्ति
मंत्र का आरम्भ होता है— “या अर्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्”
अर्थात् जो प्रारम्भ में जलराशि के भीतर या उससे सम्बद्ध थी।
वैदिक साहित्य में "सलिल" केवल साधारण जल नहीं है। अनेक स्थानों पर यह आदिम, अव्यक्त, ब्रह्माण्डीय द्रव्य (Primordial Substance) का प्रतीक है।
वैज्ञानिक दृष्टि
आधुनिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान के अनुसार प्रारम्भिक पृथ्वी अत्यन्त उष्ण थी। करोड़ों वर्षों के बाद उसका तापमान घटा और जलवाष्प संघनित होकर महासागरों का निर्माण हुआ।
कुछ वैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुसार—
- पृथ्वी के प्रारम्भिक इतिहास में विशाल जलराशियाँ बनीं,
- जीवन का उद्भव भी जल में हुआ,
- और महासागर जीवन के प्रथम पालने (Cradle of Life) बने।
ऋषि का "अर्णव" और "सलिल" का उल्लेख इस आदिम जलमय अवस्था की स्मृति जैसा प्रतीत होता है।
“मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः” : ज्ञान द्वारा अन्वेषण
मंत्र का दूसरा भाग कहता है— “यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः”
अर्थात् मनीषियों ने अपनी बुद्धि, युक्तियों और ज्ञान के माध्यम से इसका अन्वेषण किया।
यहाँ "माया" का अर्थ भ्रम नहीं है।
वैदिक साहित्य में माया का एक अर्थ है—
- रचनात्मक शक्ति,
- ज्ञान की विधि,
- मापन और विवेचन की क्षमता।
इस प्रकार ऋषि यह संकेत करते हैं कि पृथ्वी के रहस्यों को समझने का कार्य जिज्ञासु मनीषियों ने किया।
आधुनिक वैज्ञानिक समानता
आज वैज्ञानिक—
- दूरबीनों से ब्रह्माण्ड का अध्ययन करते हैं,
- उपग्रहों से पृथ्वी का निरीक्षण करते हैं,
- भूगर्भीय अनुसंधान करते हैं,
- जलवायु और जैव-विविधता का विश्लेषण करते हैं।
ज्ञान के द्वारा प्रकृति का अन्वेषण करने की यही प्रक्रिया इस मंत्र में "मनीषिणः" के माध्यम से व्यक्त हुई प्रतीत होती है।
पृथ्वी का “हृदय” : एक गहन प्रतीक
मंत्र का सबसे रहस्यमय भाग है— “यस्या हृदयं परमे व्योमन्”
अर्थात् जिसका हृदय परम आकाश में स्थित है।
यह कथन प्रथम दृष्टि में विरोधाभासी प्रतीत होता है, क्योंकि पृथ्वी का हृदय तो पृथ्वी के भीतर होना चाहिए।
किन्तु वैदिक कवि यहाँ भौतिक भूगोल की नहीं, बल्कि दार्शनिक सत्य की बात कर रहे हैं।
दार्शनिक अर्थ
पृथ्वी का वास्तविक आधार किसी भौतिक वस्तु में नहीं, बल्कि उस सार्वभौमिक व्यवस्था में है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को संचालित करती है।
अर्थात् पृथ्वी का हृदय ब्रह्माण्डीय नियमों में निहित है।
वैज्ञानिक समानता
आज हम जानते हैं कि पृथ्वी का अस्तित्व अनेक ब्रह्माण्डीय कारकों पर निर्भर है—
- सूर्य से उचित दूरी,
- गुरुत्वाकर्षण,
- चुम्बकीय क्षेत्र,
- ग्रहों की गतियाँ,
- ब्रह्माण्डीय स्थिरांक।
पृथ्वी अकेली नहीं है; उसका जीवन सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
“सत्येनावृतममृतम्” : प्राकृतिक नियमों की अमरता
मंत्र आगे कहता है— “सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः”
अर्थात् पृथ्वी का अमृतस्वरूप सत्य से आच्छादित है।
यहाँ "सत्य" केवल नैतिक सत्य नहीं है।
यह ब्रह्माण्डीय सत्य, अर्थात् वे नियम हैं जो कभी नहीं बदलते।
वैज्ञानिक दृष्टि
आधुनिक विज्ञान में इन्हें हम कहते हैं—
- प्राकृतिक नियम (Natural Laws)
- भौतिक स्थिरांक (Physical Constants)
- गणितीय नियम
यदि ये नियम बदल जाएँ तो—
- ग्रहों की कक्षाएँ बदल जाएँ,
- जीवन असम्भव हो जाए,
- ब्रह्माण्ड की संरचना ही टूट जाए।
ऋषि का कथन है कि पृथ्वी की अमरता और स्थिरता का आधार यही "सत्य" है।
राष्ट्र और पृथ्वी
मंत्र के अन्त में प्रार्थना है—“सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे”
यह पृथ्वी हमारे राष्ट्र में तेज और बल स्थापित करे।
यहाँ "राष्ट्र" शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
वैदिक साहित्य में राष्ट्र का अर्थ केवल राजनीतिक राज्य नहीं था।
राष्ट्र का अर्थ था— भूमि,जनसमूह,संस्कृति,ज्ञान,नैतिक व्यवस्था।
ऋषि पृथ्वी से केवल व्यक्तिगत सुख नहीं माँगते; वे सम्पूर्ण राष्ट्र की शक्ति और तेज की कामना करते हैं।
आधुनिक राष्ट्र-विज्ञान की दृष्टि
किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सैन्य सामर्थ्य नहीं होती।
उसकी शक्ति निर्भर करती है—
- प्राकृतिक संसाधनों पर,
- कृषि पर,
- पर्यावरणीय संतुलन पर,
- वैज्ञानिक प्रगति पर,
- सांस्कृतिक चेतना पर।
इन सभी का आधार पृथ्वी है।
इस दृष्टि से यह मंत्र पर्यावरण और राष्ट्रनिर्माण के सम्बन्ध को अत्यन्त गहराई से समझता है।
पृथ्वी सूक्त का अष्टम मंत्र पृथ्वी की उत्पत्ति, उसके ब्रह्माण्डीय आधार, ज्ञान द्वारा उसके अन्वेषण तथा राष्ट्रजीवन में उसकी भूमिका का अत्यन्त गम्भीर विवेचन प्रस्तुत करता है। आदिम जल की अवधारणा हमें सृष्टि-विज्ञान की याद दिलाती है, मनीषियों का अन्वेषण वैज्ञानिक जिज्ञासा का प्रतीक बनता है, पृथ्वी का हृदय ब्रह्माण्डीय व्यवस्था की ओर संकेत करता है और सत्य से आवृत अमृतस्वरूप प्राकृतिक नियमों की स्थिरता को उद्घाटित करता है।
अन्ततः ऋषि यह उद्घोष करते हैं कि किसी राष्ट्र का तेज, बल और स्थायित्व पृथ्वी के साथ उसके संतुलित सम्बन्ध पर निर्भर है। यही कारण है कि यह मंत्र पर्यावरण, विज्ञान, दर्शन और राष्ट्रचिन्तन का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।
समापन श्लोक
सलिले यदभूदादौ विश्वबीजं धरात्मनः।सत्यावृतं तदन्तःस्थं राष्ट्राय बलमावहेत्॥
(यह व्याख्यात्मक श्लोक है, मूल वैदिक मंत्र नहीं।)
मुकेश ,,,,,,,
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