शब्दयात्री : ओंकार की प्रतिध्वनि
शब्दयात्री : ओंकार की प्रतिध्वनि
कुछ ध्वनियाँ सुनाई नहीं देतीं, फिर भी जीवन भर हमारे भीतर गूँजती रहती हैं।
उसके जाने के बाद मैंने बहुत समय तक शब्दों में उसे खोजा। फिर एक दिन लगा कि वह शब्दों के पार चली गई है। जैसे कोई मंत्र बार-बार जपने के बाद अक्षरों से मुक्त होकर केवल स्पन्दन बन जाता है।
तभी मुझे ओंकार का स्मरण हुआ।
ओम्—जिसे ऋषियों ने नाद कहा, सृष्टि का मूल स्पन्दन कहा। उसका उच्चारण समाप्त हो जाता है, पर उसकी प्रतिध्वनि कुछ क्षण तक हवा में बनी रहती है। और कभी-कभी उससे भी अधिक देर तक भीतर।
वह भी अब मेरे जीवन में वैसी ही प्रतिध्वनि है।
न उसका चेहरा स्पष्ट है।
न उसकी आवाज़।
न वे दिन जिन्हें मैंने कभी बहुत क़ीमती समझा था।
लेकिन उसके साथ जो एक आन्तरिक कम्पन जन्मा था, वह अब भी मौजूद है। जैसे ध्यान के बाद भी भीतर हल्की-सी गूँज बनी रहती है।
मैंने समझा कि प्रेम का अन्त मौन में होता है, पर वह मौन रिक्त नहीं होता। उसमें एक नाद छिपा रहता है। वही नाद मनुष्य को भीतर की ओर ले जाता है।
अब जब मैं अकेला बैठता हूँ, तो मुझे उसकी कमी कम और उसकी प्रतिध्वनि अधिक महसूस होती है। वह मुझे पुकारती नहीं, रोकती नहीं, लौटने को नहीं कहती। वह बस मेरे भीतर एक सूक्ष्म लय की तरह बहती रहती है।
शायद यही कारण है कि कुछ सम्बन्ध टूटते नहीं, रूप बदल लेते हैं।
वे संवाद से ध्यान बन जाते हैं।
स्मृति से नाद।
और नाद से मौन।
— मुकेश
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