शब्दयात्री : अक्षयवट
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शब्दयात्री : अक्षयवट
हर नगर में कुछ वृक्ष होते हैं।
और हर मनुष्य के भीतर भी।
वे वृक्ष समय से बड़े होते हैं। ऋतुएँ उन्हें छूती हैं, पर समाप्त नहीं कर पातीं। लोग आते हैं, चले जाते हैं। पीढ़ियाँ बदल जाती हैं। मगर वे खड़े रहते हैं—अपनी जड़ों में सदियों का मौन लिए।
मेरे भीतर भी एक अक्षयवट है।
मैं उसके नीचे अक्सर आकर बैठता हूँ।
पहले मुझे लगता था कि प्रेम एक फूल है—सुन्दर, सुगन्धित और क्षणभंगुर।
फिर लगा, वह एक ऋतु है।
उसके बाद लगा, वह एक नदी है।
लेकिन अब कभी-कभी महसूस होता है कि वह एक वृक्ष था।
एक ऐसा वृक्ष जिसकी छाया का एहसास उसके चले जाने के बाद हुआ।
जब वह थी, तब मैं उसके साथ बिताए हुए समय को देखता था।
जब वह नहीं रही, तब मैंने जाना कि उसने मेरे भीतर कितनी जड़ें छोड़ दी हैं।
अक्षयवट की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह पुराना है।
उसकी विशेषता यह है कि वह टिके रहना जानता है।
आँधियों के बाद।
बाढ़ों के बाद।
सूखे के बाद।
वह हर बार अपने भीतर से जीवन निकाल लेता है।
शायद स्मृतियाँ भी ऐसी ही होती हैं।
वे हमें बाँधती नहीं, सहारा देती हैं।
यदि हम उन्हें पकड़कर न बैठ जाएँ।
मैं उस वृक्ष के नीचे बैठकर कभी उसका नाम नहीं लेता।
अब आवश्यकता भी नहीं।
वृक्ष अपनी छाया का परिचय नहीं देता।
छाया स्वयं बता देती है कि कहीं ऊपर कोई विशाल मौन खड़ा है।
साँझ ढलती है।
पत्तों के बीच से छनकर आती हुई रोशनी धीरे-धीरे कम हो जाती है।
मैं उठता हूँ।
वृक्ष वहीं रहता है।
जैसे कल था।
जैसे वर्षों पहले था।
और तब मुझे लगता है—
मनुष्य के जीवन में कुछ सम्बन्ध फल की तरह नहीं होते जिन्हें तोड़ लिया जाए।
वे अक्षयवट की तरह होते हैं।
उनके नीचे बैठकर हम बदल जाते हैं।
और जब उठकर चले जाते हैं,
तब भी उनकी छाया बहुत दूर तक हमारे साथ चलती रहती है।
— मुकेश
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