शब्दयात्री : अस्वप्नाः

 शब्दयात्री : अस्वप्नाः

कुछ लोग रात में सोते हैं।

कुछ लोग सपने देखते हैं।

और कुछ ऐसे भी होते हैं जो दोनों के बीच कहीं ठहरे रहते हैं।

मैंने अथर्ववेद में एक शब्द पढ़ा था—अस्वप्नाः

वे जो सोते नहीं।

या यूँ कहिए, वे जो सजग रहते हैं।

जो पहरा देते हैं।

जो अन्धकार के बीच भी अपनी चेतना की लौ बुझने नहीं देते।

उसके जाने के बाद कई रातें ऐसी आईं जब नींद तो आई, पर विश्राम नहीं आया। आँखें बन्द थीं, लेकिन भीतर कोई जाग रहा था। कोई चुपचाप मेरी स्मृतियों के द्वार पर बैठा हुआ था।

पहले मुझे लगता था कि वह बेचैनी है।

फिर समझ में आया कि वह एक प्रकार की रखवाली थी।

मेरे भीतर जो कुछ सचमुच मूल्यवान था—कुछ प्रेम, कुछ करुणा, कुछ प्रतीक्षा, कुछ शब्द—उनके पास कोई अस्वप्न प्रहरी बैठा था।

वह मुझे टूटने नहीं देता था।

वह मुझे भूलने भी नहीं देता था।

और शायद पूरी तरह डूबने भी नहीं देता था।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि मनुष्य को जीवन में कुछ अस्वप्न क्षण अवश्य मिलने चाहिए।

ऐसे क्षण, जब वह संसार के शोर से अलग होकर अपने भीतर के मौन को सुन सके।

जहाँ न स्वप्न हों, न भ्रम।

केवल जागरूकता।

केवल साक्षीभाव।

केवल वह सत्य, जो हमारे सारे कथनों और स्मृतियों के पीछे शान्त बैठा रहता है।

उसकी स्मृति अब मेरे भीतर स्वप्न की तरह नहीं आती।

वह एक अस्वप्न उपस्थिति है।

निद्रा के पार।

कल्पना के पार।

एक शांत दीपशिखा की तरह।

जो जलती कम है,

प्रकाश अधिक देती है।

— मुकेश

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