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Tuesday, 6 March 2012

कुछ न’ किया जाये

बैठे ठाले की तरंग ------------

सुबह से
‘कुछ’ नही किया
‘कुछ’ करने की इच्छा भी नही
सिर्फ इच्छा से क्या होता है ?
कुछ करना भी तो होता है
लिहाजा पहले तय कर लिया जाय
यह ‘कुछ करना’ क्या होता है
‘कुछ’ करने का मतलब 
‘कुछ भी’ किया जाय
जैसे कि किताब पढ़ी जाये
चाय पिया जाय
कविता लिखा जाये
ठिठोली किया जाये
जुगाली किया जाये
चुम्मा चाटी किया जाये
न समझ आये तो
‘कुछ’ और किया जाये
जैसे मजबूरी किया जाये
बाबूगिरी किया जाये
मेहनत मजदूरी किया जाये
लोहारगिरी किया जाये
या फिर नेतागीरी, गुण्ड़ागीरी
जैसा कुछ किया जाये
नही तो
ध्यान व्यान किया जाये
पूजा पाठ किया जाये
यहां आया जाये
वहां जाया जाये
इसे गरियाया जाये
उसे गरियाया जाये
या फिर खुद को महिमामण्ड़ित किया जाये
फिर भी ‘कुछ’ न समझ आये तो
उठाके बंदूक सबको
गोली मारी जाये
फिर बैठ कर ‘कुछ न’ किया जाये


मुकेश इलाहाबादी
01.06.2011

एक मुसाफिर की डायरी से --------------



ज़िदंगी की दो तिहाई सड़क नाप आया। न जाने कितने जंगलात, खाई, खंदक और रेगिस्तान पार कर आया। लेकिन मंजिल के नाम पर महज कुछ सराय खाने या भटियार खाने मिले। जहां चंद लम्हात की सहूलियत और फिर रवानगी, न मिलने वाली मंजिल की। लिहाजा अब तो सारे अरमानों को कफ़न दे दिया है और सफ़र को ही मुक़ददर मान लिया है।
अपने मुकददर को ही लिये दिये उन दिनों भी चल रहा था, कि राह में एक सरायखाने से इत्तिफाक हुआ। जिसकी बातें आज एक अर्से के बाद भी यादों की पगड़डी में मील के पत्थर सा ठुंकी हुयी हैं।
बात उन दिनों की है जब यह षख्स जवान हुआ करता था। दिल में जोश  व बदन में ताकत हुआ करती थी। चटटान को तोड़ने व नदियों को पार करने का हौसला हुआ करता था। लेकिन जिसका दिल बच्चों सा मासूम था। अंदाज मस्ती भरा था। वह अपने कधों तक झूलते बालों व अलमस्त फक्कडी अंदाज को लिये दिये एक दिन अपनी मुकम्मल मंजिल की तलाष में निकल पड़ा। भटकता रहा शहर दर षहर जंगल दर जंगल। उस दौरान न जाने कितने दरख्तों को अपना साया बनाया न जाने कितने पड़ावों पे रात गुजारी न जाने कितने खेत खलिहानों को रौंदा मगर कहीं कोई मंजर उसे रास न आता, उसे लगता यह वह ठौर नही जहां के लिये वह निकला है। वह कुछ सोचता समझता, फिर आगे बढ जाता नई राहों के दरमियां।
ऐसे मे एक दिन जब फलक पे चांद भी न था सितारे भी न थे रौशनी के लिये। दूर दूर तक किसी बसेरे का नामो निशा तक न था। कोई शजर भी न था। पावों में थकन भी थी पोर पोर दुख रहा था। भूख से तन व मन अकुला रहे थे। चलना मजबूरी थी। ऐसे मे ही दूर एक रोषनी टिमटिमाती नजर आयी, मन मे कुछ हौसला आफजाई हुयी। कदमों को कुछ ओर तेज रफतार दी। मगर पांव थे कि तेजी इख्तियार ही न कर रहे थे। लिहाजा घिसटते कदमों से वह काफी रात गये दिये के जानिब पहुंच ही गया।
रोशनी एक सरायखाने की थी। सरायखाना दरो दीवार का न था। उसकी दीवारें काले घनेरे आबनूसी गेसुओं की थीं। रोशनी के नाम पे खूबसूरत ऑखें टिमटिमा रहीं थी। भूख के लिये दिल परोसा जाता और आराम के लिये मरमरी बाहें थी। जिनके आगोश  मे रात कब बीत जाती पता न लगता था।
गये रात पहुंच मुसाफिर ने एक रात रुकने की इल्तजा की । मालकिन ने अपने खूबसूरत अंदाज से रहने का खाने का बेहतरीन इंतजाम किया उसे लगा जैसे मालकिन ने अपना दिल ही परोस दिया हो। मुसाफिर उस रात चैन की नींद सोया सुबह उठ के अपने सफर के लिये रवानगी चाही। तो उस सराय की मालकिन ने अपनी बला की खूबसूरत ऑखों से सवाल किया।
‘मुसाफिर तुम्हे किस राह जाना है। इस मजिंल के सारे रास्तों को अच्छे से जानती हू।’
मुसाफिर अचकचाया। 
कुछ देर की खामूषी के बाद अपनी सूनी ऑखों को दूर गगन मे देखते हुये कहा।
‘मोहतरमा। मेरी कोई मंजिल होती तो बताता। कोइ्र मुकम्मल जहां होता तो बताता। मै तो भटका हुआ मुसाफिर हूं। चलते ही रहना जिसकी नियत है और वही मंजिल लिहाजा मै किस राह के बाबत तुमसे पूंछू।’
ऐसा जवाब और ऐसा मुसाफिर उसने आज तक न देखा था। लिहाजा उस सरायखाने की खूबसूरत मालकिन कुछ देर उसकी बडी बडी ऑखों व चौडे कंधों को देखती रही। फिर न जाने क्या सोच के बोली।
‘मुसाफिर, अगर तुम्हारी कोई निष्चित मंजिल नही है। किसी भी राह जाना है और कभी भी जाना है तो तुम कुछ दिन और इस सरायखाने में क्यूं नही ठहर जाते। हो सकता है तब तक तुम्हे अपनी मंजिल याद आ जाये, जिसे हो सकता है किसी हादसे में भूल चुके हो। या कोई फकीर या पहुंचा हुआ तुम्हारी मजिंल का पता ले कर आ जाये। तुम ओर ज्यादा भटकने से बच जाओ’
मुसाफिर को यह बात पसंद आयी। उसने अपने असबाब फिर से उतारे। हालाकि असबाब के नाम पे था ही क्या। दो चार किताबें दो चार कपडे लत्ते और हुक्का जिसे वह तसल्ली से पीता। सुबह और षाम।
मुसाफिर ने फिर दिन वहीं काटा षाम काटी अब रात थी।
वह रेगिस्तानी रात कुछ देर बाद सर्द होने लगी। इतनी सर्द कि बदन की चादर भी ठण्ड न रोक पा रही थी। लिहाजा दोनो ने उपले की आग जलायी और आमने सामने बैठ बतियाने लगे।
दोनों बतियाते भी जाते और दूर तक फैले हुये सर्द रेतीले मंजर केा देखते भी रहतेे। अचानक
औरत ने मुसाफिर की ऑखों की गहराई को देखते हुए सवाल किया
‘मुसाफिर, तुम मुहब्बत को क्या समझते हो।’
आदमी ने अपनी चादर से खुद को और लपेटा। अलाव की राख को कुरेदा। बुदबुदाया।
‘वैसे तो मुझे मुहब्बत के मुताल्लिक कुछ अता पता नही है। पर जहां तक जाना है और अफसानों में पढा है। मुहब्बत अलाव की आग है जो पहले तेज जलती है फिर धीरे धीरे जलती है बहुत देर तक। यह आग राख के अंदर भी धीरे धीरे सुलगती रहती है। जो कभी भी जरा सा कुरेदने से फिर भडक उठती है। और मुहब्बत ही वह आग है जो जलने के बाद इंसान को सुहानी तपिष भी देती है और जिंदा रहने की ताकत भी बनती है।’
औरत ने भी आग के उपर अपने नर्म हाथ सेंकते हुये मुसाफिर की ऑखों में आखें डाली क्या तुमने कभी इस तपिष का लुत्फ लिया है।’
मुसाफिर ने हालाकि दुनियादारी बहुत देखी थी। जिस्मों का खेल भी देखा था और खेला था मगर न जाने कयूं इस दौर से न गुजरा था। उसकी ऑखें भभक उठीं। मुस्कुराया। और हौले से न में षिर हिला दिया।
औरत भी मुस्कुराई ‘बडी अजीब बात है तुम्हारे जैसा नौजवान यह कह रहा है। क्या कभी किसी औरत ने तुम्हे लुभाया नही।
‘नही’ मुसाफिर ने धीरे से कहा।
दोनो खामोष हो गये। फिर मुसाफिर ने कहा ‘अच्छा यह बताओ इस बाबत तुम क्या सोचती हेा’
औरत ने अपने दोनो हाथ अलाव के उपर ले जाकर कहा ‘हां, तुम्हारी बात ठीक है पर इस आग से सिर्फ ठंठ से बचने के लिये हाथ तापा जाये तो ठीक वर्ना बेठीक, अक्सर लोग इस आग से  अपने वजूद को ही जला लेते हैं। जिससे मै इत्तिफाक नही करती।’
मुसाफिर ने कुछ नही कहा। बस उसने अलाव की बुझती हुयी आग को कुरेदा और फूंक देकर  आंच को फिर से बढानी चाही। मगर तब तक औरत जम्हाई लेकर उठ चुकी थी।
‘चलो सोया जाये रात काफी हो चुकी है। ’ औरत ने कहा।
दोनो अपने अपने बिस्तरे पर जा चुके थे। पर अब तक अलाव की आग उनके अंदर जल चुकी थी। जो दोनो के तन व मन को तपा रही थी।
कुछ देर बाद अंधेरे में मुसाफिर और भटियारिन एक दूसरे के अलाव को कुरेद रहे थे।
मुसाफिर खुष था  उसे लगा उसे उसकी मंजिंल मिल चुकी है जिसकी उसे तलाष थी। लेकिन यही उसकी भूल थी।
सराय मालकिन होषियार और दुनियादार औरत थी। वह मुसाफिर को रहना खाना और सब कुछ देती यहां तक की मुहब्बत भी मगर हर चीज का पूरा दाम वसूल लेती जिसके लिये कोई मुरउव्वत न थी।
दिन धीरे धीरे बीत रहे थे। मुसाफिर अपनी तरह खुष था और औरत अपनी तरह।
मगर जैसे जैसे मुसाफिर की असर्फियां खत्म होने लगी वेैसे वैसे ही। सराय मालकिन के अलाव की आग भी मद्धम होती जा रही थी।
एक दिन ऐसा भी आया जब उसके पास मुसाफिर के लिये तनिक भी तपिष न थी।
एक रात जब उस मासूम मुसाफिर ने औरत को एक दूसरे रईस मुसाफिर के साथ अलाव तापते देखा तो काफी मायूस हुआ।
मुसाफिर ने उसी वक्त अपना सारा असबाब एक बार फिर अपने कांधे पर लादा। वही असबाब दो चार कपडे लत्ते कुछ किताबें और अपना हुक्का जिसे वह सिर्फ सुबह षाम तसल्ली से पीता था।
तब से आजतक एक बार फिर वह मासूम मुसाफिर सफर में है। एक अंतहीन सफर में।
जानते हो वह मुसाफिर कोई नही यह कलमकार ही है।

यह कह के मुसाफिर ने अपनी कलम बंद कर दी।
मगर ...
कुछ लोगों का कहना है वह मासूम मुसाफिर अभी भी भटक रहा है उस रेगिस्तान में अपनी मुकम्मल मंजिल की तलाष में। जिसमें अभी भी कुछ चिंगारियां सुलग रही है वक्त और माकूल हवा के इंतजार में। मगर वह अभी भी नही चाहता कि यह आग जब सुलगे तो कोई हाथ सिर्फ तापने भर को आये।
कुछ जानने वालों का कहना है कि .....
वह मासूम मुसाफिर किन्ही बियाबानों में भटकते भटकते फना हो गया। जिसे किसी भले इन्सान ने वही रेत में दफन कर दिया उसकी किताबो और हुक्के के साथ। हालाकि हुक्के में कुछ राख और आग अभी भी बची थी।
दफनाने वाले ने उसकी कब्र पे उसी की चादर ओढा दी थी।
और उसी की किताब का यह असरार भी टांक दिया।

मुहब्बत को हमने अलविदा कह दिया है।
खु़द अपने अरमानों को कफ़न दे दिया है


मुकेश श्रीवास्तव


Monday, 5 March 2012

हवा में अजब सी सरसराहट है

बैठे ठाले की तरंग ----------

हवा में अजब सी  सरसराहट है
ये तूफ़ान के पहले की आह्ट है

शहर में अजब सी बेचैनी क्यूँ ?
किसी साजिश की सुगबुगाहट है

रात गयी सहर होने होने को है
फलक में परिंदों की चहचाहट है

ये कठिन दौर का ही तकाजा है
हर रिश्ते में अजब कडूआह्ट है

उनसे जो भी मिला जाँ से गया
अजब कातिलाना मुस्कराहट है  

मुकेश इलाहाबादी -----------




देख तमाशा, दुनिया का (part -2)


                 देख तमाशा, दुनिया का


                  'गुरु पेड के नीचे ध्यान लगा के बैठा है। चेला पंखा झल रहा है’
                   दोनो दूर किसी औरत के रोने की आवज अनकते हैं ’
गुरु     चेला लगता है कोई रो रहा है ?
चेला    ‘कान आवाज की तरफ करके’ लगता तो मूझे भी है।
गुरु      देख तो कौन दुखी आत्मा है। उस यहां ले के आ।
चेला    मने दुकान पे ?
गुरु     अबे आश्रम बोल आश्रम।
चेला     जो गुरदेव।
            ‘चेला आवज की तरफ जाता है। वहां एक औरत रोती बैठी है। वह चेले को अपनी तरफ आते देख और जोर जोर से    
             रोने  लगती है’


चेला     औरत तू कौन है ?
औरत   ‘आंसू पोंछते हुए’ दुखियारी हूं साधू महराज।
चेला     वो तो तेरे को देख के ही लगता है। अच्छा बता तू रो क्यों रही है ?
औरत   ‘सुबुकते हुए’ मेरे मरद ने द्यर से निकाल दिया।
चेला     तैने उल्टी सीधी माग की होगी।
औरत   नही महराज
चेला     तो तूने उसका कहा न किया होगा।
औरत    यह बात भी नही
चेला      तो फिर बदचलनी की वजह होगी ?
औरत    नही
चेला       तो फिर ?
औरत    मरद कहता है मै बांझ हूं
चेला      ऐसा काए कू बोला।
औरत    शादी के चार बर्ष हो गये अभी बच्चा नही जन पायी।
चेला       एसा कर तू मेरे साथ चल मेरे एक गुरु महाराज हैं। उनके पास हर समस्या का हल है। बहुत सिद्ध पुरुष हैं। उन्हे पेड 
              के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ है।

औरत    वह कहां मिलेंगे ?
चेला      वही पेड के नीचे उनका आश्रम है। आ चल।
             ‘औरत आंसू पोंछ के चेला के पीछे पीछे चल देती है।’
   
             ‘गुरु को दोनो को आते देख ध्यान का बहाना बना लेता है।’
चेला      जय हो गुरु महाराज की
गुरु       ‘आर्षिवाद की मुद्रा मे’ बोलो बच्चा
चेला      क्या हुआ बच्चा
चेला      इस दुखियारिन को इसके मरद ने द्यर से निकाल दिया।
गुरु        तो मुझसे क्या चाहती है ?
चेला      आपका आर्षिवाद महराज।
             ‘गुरु औरत को गौर से देख कर’
गुरु        तेरी शादी को कितन बखत हो गया ?
औरत    चार साल महराज
गुरु        और अभी तक कोख नही भरी   
औरत    नही महराज   
गुरु        तूने किसी डाक्टर हकीम को दिखाया।
औरत    नही महराज
गुरु        अल्ट्रासाउंड वगैरह कराया
औरत    नही महराज
गुरु        और तेरे मरद ने
औरत    पता नही महराज
गुरु        तो वह कैसे कह सकता है तू बांझ है
औरत    पता नही महराज
गुरु        ‘अपनी आसनी से एक पुडिया निकाल कर देता है।’ अच्छा  ऐसा कर यह पुडिया ले जा और उपर वाले का नाम लेकर 
              खालेना। और डाक्टर को जरुर दिखा लेना। उपर वाला जरुर तेरी इच्छा पूरी करेगा। वह बडा दयालू है।

              ‘औरत गुरु का पैर छे के आर्षिवाद ले के जाती है। चेला उसे बाहर तक छोडने आता है।चेला औरत से’
चेला      देख इस पुडिया से फायदा जरुर होगा। और अगर न होतो फिर
             आ जाना। गुरु से झाड फूंक करा दूंगा जरुर फायदा होगा।
             ‘औरत जाती है।’

चेला      ‘बाहर से आते आते’ गुरु एक और भक्त आया है।
गुरु        कौन है।
चेला      एक यूवक है महराज
गुरु        बुलाओ
             ‘यूवक आ कर प्रणाम कर के खडा होता है।’
गुरु        बोलो बच्चा
यूवक     महराज एमे बीए पढ लिया पर अभी तक किसी धंधा पानी से नही लग पाया हूं। कोई रास्ता आप ही सुझाइये। उम्मीद
             से आया हूं।

गुरु        तू झगडा फसाद करवा सकता है
यूवक     नही महराज
गुरु        झूठ फरेब जानता है
यूवक     नही महराज
गुरु        चापलूसी या चमचागिरी जानता है
यूवक    नही महराज
गुरु        अंग्रेजी फंग्रेजी जानता है।
यूवक    नही महराज
गुरु        तो एसा कर। सबसे पहले किसी पर्सनालिटी डेवलपमेंट कोर्स ज्ववाइन कर। आज कल जगह जगह इसकी
             दुकान  खुल गयी है।
सुना है कुछ हमारे जैसे गुरु भी यही सब सिखा रहे हैं
चेला      अगर नही हो तो हमारे यहां आ जाना यहां भी यह सब सिखाया जाता है।
             ‘यूवक भी प्रणाम करके जाता है। चेला छेाडने जाता है’
             ‘चेला आकर।’
चेला     गुरु एक और भक्त आया है।
गुरु       उसे भी जल्दी भेजो मेरे ध्यान का बखत हो रहा है
             ‘एक मरियल सा आदमी आता है।’
गुरु         कोन जात हो भाई
आदमी   जी जी महाराज
गुरु        जी जी मने
आदमी    मने गरीब गुरबा महराज
चेला        तो तू महाराज के इतने करीब क्यों जा रहा है। थेाडा दूर से बात कर।
गुरु          रहने दे रहने दे हमारे यहां सभी बराबर हैं।
गुरु         बता तेरी क्य समस्या है।
आदमी    गरीबी और षोषण महाराज
गुरु          अच्छा।
आदमी     हां महराज कोई उपाये बतायें
गुरु         ऐसा कर तू चुनाव मे खडा होजा।
आदमी    महराज उसके लिये भी तो धन और बल चाहिये। और वही तो हमारी समस्या है।
चेला        तू चिंता क्यू करता है गुरु का आर्षिवाद है तो तेरे को सब कुछ मिलजायेगा। बस तू चुनाव की तैयारी कर।
             ‘आदमी खुषी खुशी  जाता है। गुरु ध्यान के लिये आख बंद कर लेता है। चेला पंखा झलता है।’

             ‘फेड आउट के बाद नट नटी का प्रवेष दोनो सूफियाना अंदाज मे गाते है’
नटी      अपढ मदारी बना है ज्ञानी
नट        देख तमाषा दुनिया का
नटी      दुनिया का भई दुनिया का
नट        देख तमाषा दुनिया का
नटी     अपढ मदारी बना है ज्ञानी
नट       देख तमाषा दुनिया का
नटी     दुनिया का भई दुनिया का
   
            ‘दोनो का प्रस्थान’
             ‘पेड के नीचे वही द्रष्य।ज्ञानी ध्यानमग्न है पर इस बार औरत महाराज का पंखा झल रही है। और चेला पैर दबा रहा 
              है।’
‘चेला बाहर देख कर’
चेला     गुरु नेता जी आये हैं।
गुरु       बुलाओ। ‘गुरु एकांत का इशारा  करता है। औरत बाहर जाती है। नेता का प्रवेष।’
            ‘नेता को प्रवेष वह भी पैर छूकर आर्षिवाद लेकर बगल मे बैठ जाता है’
गुरु       ‘मूस्कुराते हुये।’ बोला बच्चा।
नेता     कुछ नही महाराज दाल रोटी चल रही है। बस आपकी क्रपा और आर्षिवाद बना रहे।
गुरु      वह तो बना ही है।
नेता    ‘हांथ जोडे जोडे’ महाराज इस बार आर्षिवाद कुछ कम दिख रहा है।
गुरु      तुम्हारा आचरण कुछ बिगड रहा था। इसलिये थोडी ताडना जरुरी थी।
नेता    ‘द्यिद्यियाते से’ ऐसा न करें महाराज कोई गलती हुयी हो तो माफ करें।
           ‘गुरु रहते हैं’
नेता     महराज सेवा मे कोई कमी हो तो बतायें। जो आप चाहें वही होगा। इषारा तो करें।
गुरु      तो जो हो रहा है होने दो
नेता    ‘रुआंसा होकर’ महराज ऐसा नकरें। बरबाद हो जाउंगा। मर जाउंगा। बीबी बच्चे अनाथ हो जायेंगे।
गुरु      तूमने भी तो बहुतो को अनाथ किया है सताया है। जैसी करनी वैसी भरनी। यह तो भगवान का नियम है। उसमे मै और
          तुम क्या कर सकते हैं।

नेता    महराज। आप सर्व सर्मथ हैं। आप सब कुछ कर सकते हैं। आप सिद्ध पुरुष हैं।
गुरु     साफ साफ बोलो क्या चाहते हो।
नेता    महराज। बस आप उस जी जी को चुनाव से हट जाने के लिय कहदे। मुझे मालुम है वह भी आपही का चेला है।
गुरु     वह नही हो सकता तुमने उसको बहुत सताया है।
नेता    महराज एक बार मौका तो दें उसे भी खुष कर दूंगा। सात पुष्तो की गरीबी दूर हो जायेगी।
गुरु     कैसे ?
नेता    ‘थोडा उम्मीद पा के चहकता है।’ महाराज चुनाव जीतने ही उसे भी किसी कमेटी का चेयर मैन वगैरह बनवा दूंगा। या
           किसी और सीट से लडवा दूंगा।

           ‘ गुरु अर्थ पूर्ण ढंग से मुस्कुराता है। और आर्षिवाद की मुदा्रमे हाथ उठाता है।’
नेता    ‘एक बीफकेष रखते हुए।’ महाराज कुछ नही आप के आश्रम के भक्तों के लिये थोड प्रसाद हैं।
            ‘गुरु मुस्कुराता रहता है। नेता पैर छूकर खुषी खुषी बाहर जाता है।’
            ‘इस बार सिर्फ गुरु और चेला मंच पर रहते हैं।’
            ‘पदमासन की मुदा्र मे ही’ चेला
गुरु       ‘झुक कर’ धंधा पानी ठीक चल रहा है
चेला     बिलकुल ठीक महराज
गुरु       चंदा चढावा आ रहा है?
चेला     उम्मीद से ज्यादा महराज
गुरु       भक्त गण खुष हैं
चेला     बहुत ज्यादा महाराज
गुरु      और कुछ ?
चेला     बस इसी तरह आपकी दया बनी रहे
           ‘गुरु मुस्कुराकर ध्यानस्थ् हो जाता है’
           ‘चेला उसके चरणों को  पखरता है और गाता है।’
चेला     गुरुर ब्रम्हा गुरुर विष्णू गरुर देवो महेष्वरह
            गुरुर साक्षात परंब्रम्ह तस्मे श्रीगुरुवे नमह।
           ‘दूसरी तरफ से नट और नटी गाते हुए आते हैं।’

नटी    अपढ मदारी बना है ज्ञानी
नट    देख तमाशा  दुनिया का
नटी    दुनिया का भई दुनिया का
नट    देख तमाशा  दुनिया का
नटी    अपढ मदारी बना है ज्ञानी
नट    देख तमाषा दुनिया का
नटी    दुनिया का भई दुनिया का
   
‘दोनो का प्रस्थान और परदा धीरे धीरे गिरता है।’
       




   
 

देख तमाशा, दुनिया का (pahlaa bhaag)


                 देख तमाशा, दुनिया का

  ‘मंच पे नट नटी व सभी कलाकार समवेत गान करते हैं’

सभी   नमस्क्रत्यम गजाननम नमस्क्रत्यम चतुर्भेर्न्यम
          नमस्क्रत्यम भरतमुनेश्रच च  नाटय  षस्त्रमापि।
   
         यदयपि समस्त ज्ञान विज्ञानं चर्तुवेदं सष्लिष्टह
         तदयपि  भरतमुनेश्रच  पंचमवेदं ही विषिष्टह

         ‘दो पात्र पीछे जाकर  मंच पर ही फ्रीज हो जाते हैं’
नट      मंगलाचरण तो हो गया
नटी    भरत मुनी व नाट्यशाश्त्र  की वंदना भी हो गयी
नट     तो चलो अब नाटक शुरू  किया जाय
नटी     हां हां क्यों नही
नट      पर अभी दर्शकों  की बंदगी तो बाकी है वह हो जाये
नटी     हां हां क्यों नही।
          ‘दोनो दर्शकों  से मुखातिब होकर’
नट     साहेबान मेहरबान कर्ददान
नटी    पीकदान थूकदान रोशनदान ।
नट     सबको सलाम अदाब नमस्कार
नटी    गुड मार्निग और सश्त्रियकाल
नट     मै हूं इस नाटक का नट यानी - सूत्रधार
नटी    और मै हूं नटी यानी इसकी सखी।
नट     दर्शकों और महानुभावों। आज तक आप लोगों ने एक नही दो नही सैकडों हजारों नाटक देखे होंगे।
नटी    दिखाये होंगे। करे होंगे कराये होंगे।
नट     पर आज जो नाटक होने वाला है वैसा नाटक नतो आप लोगों ने देखा होगा।
नटी    न दिखाया होगा।
नट     न करा होगा न कराया होगा।
नटी    न सुना होगा न सुनाया होगा
नट     पर यह यह बात तो सभी कहते हैं
नटी    पर यह बात हम कसम खा के कहते हैं।
नट     कसम गीता की कुरान की बाइबिल की
नटी    कसम धरती माता की कसम हेन की कसम तेन की।
नट     नाटक के नाम पे जो कुछ भी करुंगे सच करेंगें।
नटी    सच के सिवाय कुछ भी नही करेंगे।
नट     सच कहू इस नाटक मे न तो कोई थीम है
नटी    और न कोई कथावस्तु
नट     न कोई गीतहै न कोई संगीत
नटी    यह न कोई एकांकी है न फुललेंथ
नटी    यह न तो हयूमरस प्ले है न तो एबर्सड
नटी    पर इसमे एक रवानगी है एक ताजगी है
नट     पर इसमे हवा सी सरसराहट है।
नटी    नदी सी कलकलाहट है।
नट     एक शोखी है एक नजाकत है।
नटी    खैर अपनी चीज की क्या तारीफ करें
नट     पर क्या करें हमी अपनी चीज की तारीफ न करेंगे तो आप देखेंगे कैसे।
नटी    सूत्रधार जी दर्शक  जानना चाह रहे हैं इस नाटक मे उददेष्य क्यों नही है। बिना उददेष्य के तो कोई चीज नही होती।
नट     अरे भाई जब इस दुनिया का ही कोई उददेष्य नही तो। इस छोटे से नाटक मे ही नाहक क्यों उददेष्य डालना।   
नट     ठीक कहा आपने हम सभी कुछ न कुछ उददेष्य को ही तो लेकर हैरान  परेशान रहते हैं।
नटी    प्यारे दर्षकों इसी लिये हम लोग आपलोगों को और हैरान परेषान नही करना चाहतै
नट     इसी लिये इस नाटक का कोई उददेष्य नहो।
नटी    पर आप इसे मजे ले ले के देखेंगे जरुर।
नट     इसके डायलाग को सुनेंगे जरुर।
नट     पर अगर आज नही सुनेंगे
नटी    तो कल जरुर सुनेंगे।
नटी    कल नही तो परसों सुनेंगे।
नटी    आप नही सुनेंगे तो आपके लडके बच्चे सुनेंगे
नट     नही तो उनके लडके बच्चे सुनेंगे
नटी    यहां नही सुनेंगे तो वहां सुनेंगे
नटी    पर सुनेंगे जरुर
नट     भले आप हमे जेल मे डालदें
नटी    किसी काल कोठरी मे बंद करवा दें
नट     किसी सुखे कुएं मे फेंकवा दें।
नटी    किसी आम या बबूल के पेड़ पे लटकवा दें
नट     कानों मे कील ठुकवादें
नटी    पर इन सबसे होगा कुछ भी नहीं
नटी    होगा कि आप और बहरे होते जायेंगे
नट     और हमारी आवाज और बुलंद होती जायेगी।
नटी    और एक दिन निनाद करके शंखनाद  करके महानद करेगी।
नट     तब आप सुनेंगे और जरुर सुनेंगे
नटी     इसी लिये हम अपनी बात
नटी    मेले मे ठेले मे
नट     शहर  मे जंगल मे
नटी    भीड मे अकेले मे
नट     गांव मे दिहात मे
नट     गली मे कूंचे मे
नटी     इन लोगों से उन लोगों से
नट     अपनी बात कहूंगा भले आप सुने या न सुने
नटी    ठेंगे से।
नट     अरे अरे। तू नाटक की भूमिका ही बांधती रहेगी। या नाटक भी शुरू करेगी।
नटी    अरे यह तो मै भूल ही गयी।
नट     चलो कोई बात नही। अब और कलाकारों  का परिचय हो जाये।
नटी    दर्षको। यह जो कलाकार र्फीज हो के खडा है। इसका नाम आप अ ब स द कोई भी रख सकते हैं।
नट     या जो आप चाहें
नटी    क्योंकि नाम मे क्या रखा  है।
नट     क्योक नाम तो एक संज्ञा है।
नटी    लिहाजा आप हिंदी की पचास मात्रकाओं मे कोई भी इसके लिये चुन सकते हैं।
नट     वैसे दुनिया वाले इसे मदारी कहते हैं।
नटी    और वह जो दुबला पतला मरियल सा तीसरा पात्र है। इसका भी कोई नाम नही है।
नट     पर इसे दुनिया वाले जमूरा कहते हैं
नटी    मदारी बहुत होशिआर  और दुनियादार आदमी है।
नटी    वह चालबाज और हरामी भी है।
नट     वह इस जमूरे का हमेषा शोषण करता है।
नटी    पर करोगे क्या। यह तो दुनिया का दस्तूर हैं
नटी    यंहा तो यही सब चलता है। हर ताकतवर अपने से कमजोर का शोषण  करता आया है।
नट     सदियों  सदियों से। युगों युगों से।
नटी    जब यह मदारी भी छोटा था। और खुद जमूरा था।
नट     तब उसका उस्ताद भी इसका शोषण करता था।
नटी    यह तो बस उसी परंपरा को बढाये जा रहा है
नट     खैर --
नटी     आप लोग और बोर नहों। अगले सीन का आनंद लें।
नट     और हम लोग नेपथ्य मे बैठ कर पानी सानी पीते हैं।
नट     मेकप वगैरह  ठीक करते है।
नटी    और कोआटिस्टों से पूंछते हैं यह सीन कैसा गया।
नट     तो लीजिये आप लोग देखें
नटी    यानी, देख तमाशा  दुनिया का
नट     दुनिया का भई दुनिया का
नटी    देख तमाषा दुनिया का

                ‘नट व नटी नेपथ्य मे जाते है।’
                 ‘दोनो पात्र हरकत मे आते हैं।’
जमूरा   वस्ताद षहर मे सर्कश  आया है
वस्ताद  तो---
जमूरा    देखने का मन कर रिया है ।
वस्ताद  अबे गरीबों के मन नही होते। मजबूरियां होती है।
जमूरा    वस्ताद वो मै नही जानता। पर मै सर्कश देखना चारिया हूं।
वस्ताद   अबे तेरे को अगर शेर  भालू और लोमड़ी ही देखना हे तो  जंगल चला जा चिड़ियाद्यर चला जा और अगर वहां नही 
             जाना चाहता तो संसद भवन चला जा, विधान सभा चला जा, कुछ नही तो नगरपालिका की मीटिंगो मे  चला जा।

जमूरा    वस्ताद मै आदमखोरों  की नही जानवरों की बात कर रहा था।
वस्ताद   जमूरे। बेचारे पिंजडे मे बंद जानवरों को देखने मे क्या मजा है।  वैसे भी आजकल जानवरों की स्वतंत्रता लेकर  
              काफी   हो हल्ला 
हो रिया है।
जमूरा    उस्ताद वहां जानवरों के अलावा भी बहुत कुछ होता है।
वस्ताद    अबे अगर थोडा बहुत झूला झाला और करतब ही देखना है तो सड़क के नट नटी का तमाशा बुरा है ? तू इन    
              गरीबों  की  रोजी रोटी क्यों  छीनना चाहता है। वे भी तो अपने ही भाई बंधु हैं।

जमूरा    आप समझते नही हैं वस्ताद वहां सर्कश  के अलावा और भी बहुत  कुछ होता है।
वस्ताद    अबे तो ऐसा कह न कि तू वहां जवान जवान छोरियों की नंगी टांगे देखना चारिया है।
जमूरा    वह बात नही वस्ताद।
वस्ताद    अवे तो फिर कौन सी बात है।
जमूरा    सुना है। सर्कशों  की भी हमारी तरह माली हालत अच्छी नही है।
वस्ताद    तो क्या तू उनकी माली हालत ठीक करने का ठेका लेकर आ रिया है।   
जमूरा     वह बात नही वस्ताद।
वस्ताद    अबे तू वह बात नही वह बात नही ही कहता रहेगा की असली बात भी कहेगा।       
जमूरा     वस्ताद सर्कश भी हमारे तमाषे की तरह एक कला है और अगर  हम कलाकार ही एक दूसरे की कला को नही  
              देखेंगे। सराहेंगे तो फिर हम लोगों की कला कैसे जीवित रहेगी।
वैसे भी आजकल लोग सर्कष की जगह। टी.वी और 
              टवेंटी टवेंटी देखना ज्यादा पसंद करते हैं ।

वस्ताद    अबे जमूरे तू इतनी बुद्धिमानी की बातें कब से करने लगा ?
जमूरा     अनुभव और मजबूरी सब कुछ सिखा देती है वस्ताद।
वस्ताद    अच्छा अच्छा। सर्कष तेा जब जायेगा जायेगा पर अभी तो चल। हम अपना खेल चालू करें। जनता बोर हो रही है।
जमूरा     वस्ताद आज तमाषा खेलने का मन नही हो रिया है।
                              ‘वस्ताद जमूरे को एक लात या धौल जमाते हुए’       
वस्ताद    आज तेरे मन को क्या हो गयेला है। लगता है तू सुबह सुबह ही ठेके पे हो के अरिया है।जमूरा वह बात नही वस्ताद।
वस्ताद    तो फिर भांग का अंटा चढा लिया होगा ?
जमूरा     वह बात भी नही वस्ताद।
वस्ताद   अबे वह बात नही वह बात नही की टेर लगाये रहेगा या असल बात भी बोलेगा।
जमूरा     वस्ताद मेरे को इष्क हो गयाला है।
वस्ताद   अबे। तेरा दिमाग तो नही फिर गयेला है।
जमुरा    नही वस्ताद। सचमुच का इष्क हो गयेला है।
वस्ताद   अबे मेढकी को जुकाम ?
जमूरा     नही वस्ताद। उस्ताद सचमुच का इष्क हो गयाला है।
वस्ताद    अबे कौन  सा इश्क ? इश्क मजाजी या इश्क  हकीकी ?
जमूरा    वस्ताद। वह सब मै नही जानता कि इष्क का भी कोई क्लासीफिकेषन होता है। मै तो सिर्फ उस एक इष्क को जानता 
              हूं जो फूलों से पेड़ों से पत्तों से हवाओं से छोटो  से बड़ों से उंच और नीच से सभी से बराबर किया जाला है।

वस्ताद   अबे चल चल आजकल तू बहोत अअंग्रेज़ी झाड़ने लगा है। बहकी बहकी बातें करता है।
जमूरा    नही वस्ताद मई सच बात कै रिया हूं।
व्स्ताद    अरे जमूरे सच कहने वाले बड़े बड़े मर गये तू कौन पिददी न पिददी का शोरबा ।
जमूरा    वस्ताद तुम बात को समझ नही रहे हो।
वस्ताद   बात तो मै तेरी बाद मे समझूंगा पर अभी चल चादर ओढ के लेट और तमाशा शुरू कर। कहा न, इतने सारेदर्शक बोर 
              हो रहे है। यहां तक कि उबासियां भी लेने लगे है। कुछ तो हाल के बाहर जाकर बीड़ी सिगरेट भी फंूकने लगे है।

              ‘जमूरा  दांषनिक अंदाज मे अपनी ही रौ मे’
जमूरा    जब दुनिया ही एक तमाशा  है तो तमाशे  को क्या तमाशा  दिखाना ?
वस्ताद    ‘झल्लाकर ’ अबे कहा न यह गल्लम सल्लम छोड और तमाशा शुरू  कर तमाशा ।
जमूरा    ‘उसी रौ मे’ वस्ताद सारी दुनिया मे तमाशा ही तो हो रहा है। मार पीट, उठा पटकट, लड़ाई झगडा हेन तेन और क्या ।
वस्ताद    लगता है तेरा दिमाग फिर गयेला है। या फिर गैस शिर  मे चढ गयेला है।
                ‘उस्ताद दर्षकों से’
वस्ताद    दर्शकों  क्षमा करें। लगता है आज इसने सुबह सुबह ही भांग का अंटा चढा लिये लियेला है।
              खैर आप लोग कहीं जायें नही मै अभी इसका नषा उतरवा कर आ रहा हूं। तब तक आप लोग सूत्रधार महोदय को 
               झेलें।

   
                 ‘दोनो कलाकार नेपथ्य मे जाते हैं।’




                        ‘नट व नटी का प्रवेश’
नटी    देखा न आप लोगों ने
नट    नाटक मे एक रवानगी है। एक तरंग हे। एक ताजगी है।
नटी    लेकिन अगर आप लोग  फिर भी बोर हो रहे हों।
नट     बोर हो हो कर कान मे तिनका और नाक मे उंगली कर रहे हों
नटी    हांथ पैर बिलावजह हिला रहे हों
नट    या इधर उधर शुतुरमुर्ग की तरह गरदन हिला हिला कर अंधेरे मे ही देख दिखा रहे हों
नटी    या आगे वाले की सीट पे पैर रख के सो रहे हों
नट    या चुरमुरा वैर्फस वगैरह खा रहे हों
नटी    या फिर गुटखा पान तंबाकू चबा रहे हों
नट    तो यह सब छोड़  बिलकुल एर्लट हो जायें
नटी    आगे का सीन देखने के लिये।
नट     यानी
नटी    ‘गाते हुय’ देख तमाश दुनिया का'
नट    दुनिया का भई दुनिया का
नटी     देख तमाशा  दुनिया का
   
                    ‘नट नटी का गाते हुये प्रस्थान।’

Sunday, 4 March 2012

दश्त ऐ तीरगी में खोजता है क्या ?


बैठे ठाले की तरंग ------------

दश्त ऐ तीरगी में खोजता है क्या ?
उदास रातों में बैठ सोचता है क्या ?

घर से निकल,  कुछ  धाम तो कर
यूँ अपनी किस्मत को रोता है क्या ?

जिसे जो करना है, कर दिखाता है
वो यूँ बढ़ चढ़ कर बोलता है क्या ?

इरादा बुलंद कर अपना औ चल तू
तुझे बीच सफ़र कोई रोकता है क्या ?

एक फूल चुन ले, और भरपूर रस ले
भंवरे  सा  इधर  उधर डोलता है क्या ?

मुकेश महफ़िल में जो सुनाना है सुना
तेरी ग़ज़ल के बीच,कोई टोकता है क्या ?

मुकेश इलाहाबादी -------

Saturday, 3 March 2012

आसमा से थोड़ी सी जगह माँगी है

बैठे ठाले की तरंग ------------
आसमा से थोड़ी, जगह माँगी है
ज़मी पे अब अपना गुज़रा नहीं
मुकेश इलाहाबादी --------------