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Thursday, 31 May 2012

सुबह का आँचल मैला देखा

बैठे ठाले की तरंग --------------

सुबह का आँचल मैला देखा
दिन भी कितना धुंधला देखा

रातों को जब घर से निकले
चाँद को  हमने  तन्हा  देखा

गुलशन में भी घूम के आये
हिज्र का मौसम फैला  देखा

शजर का हर पत्ता जला हुआ  
सूरज  आग  का  गोला  देखा

आखों मे हरदम बहता दरिया
दिल   के  अन्दर  शोला  देखा

मुकेश इलाहाबादी ------------

Wednesday, 30 May 2012

आखों में कुछ शोले -दिल में तूफां डाल दो

बैठे ठाले की तरंग ----------------------
आखों में कुछ शोले -दिल में तूफां डाल दो
लहू  बन  गया  आब थोडा तेज़ाब डाल दो!
मुकेश इलाहाबादी ----------------------

काली है रात तो क्या ?

बैठे ठाले की तरंग ---------------
(किसी काली - बरसती - पहाडी रात की
ख़ूबसूरती से अभिभूत हो के ये पंक्तियाँ
खुद ब खुद उतरी हैं - हो सकता है आप
लोगों को पसंद आये -)


काली है रात
तो क्या ?
गीत गाओ - सुमधुर
अबोली है
रात सांवली
कुछ तो बतियाओ - सुमधुर
पर्वतों से है उतरती
काली उर्वशी
देह चन्दन
मन कुसुम
है रात श्यामला उर्वशी ------
काली है रात
तो क्या ?
गीत गाओ सुमधुर
प्रेम पाप पुण्य की
वर्जनाओं में कब बंधा ? - सुमधुर
फुसफुसाहटें बन जाएँ होंठ
ये रात काली - सुमधुर
उर्वशी के उच्छ्वास से
बन जाए गीत सुमधुर
नीद में पक्षी हैं - युगन्बद्ध
गीत गाओ - सुमधुर
रात श्यामली - उत्तुंग उरोज
प्यासे हैं होंठ
बरसो रे मेघ - सुमधुर
काली हैं रात तो क्या ?
गीत गाओ - सुमधुर
  -









 








मुकेश इलाहाबादी ----------------

Monday, 28 May 2012

एक दिन कच्ची धुप का छोटा चकत्ता



बैठे ठाले की तरंग -------------------
एक दिन
कच्ची धुप का
छोटा चकत्ता
खिल आया
मेरे आँगन मे
तेरे आँगन मे
तुम मुस्कुराईं
अपने आँगन मे
मै हंसा 
अपने आँगन मे,
दुसरे दिन
कुछ बड़ा होकर
फिर खिला
धुप का वो
छोटा चकत्ता
मेरे आँगन मे
तेरे आँगन मे
धीरे धीरे बन गयी
आदत - उस चकत्ते की
खिलने की
खिलखिलाने की
कभी मेरे आँगन मे
कभी तेरे आँगन मे
एक दिन तुमने
टांकना चाह उसे अपने आँचल मे
तब छिटक कर
वह चकत्ता
दूर जा लगा दीवार से
और तुम ताकती रह गयी
अपने रीते आँगन को
जब मैंने चाहा भरना बाहों मे
उस छोटे चकत्ते को
इठला कर दूर जा लगा क्षितिज से
और मै देखता रह गया
अपने सूने आँगन को
और -----
आज भी -
हसरत भरी निगाहों से देखता हूँ
मै अपने सूने आँगन को
तुम अपने रीते आँगन को
जब कभी कोई
धुप का छोटा चकत्ता
खिलता है
मेरे आँगन मे
तेरे आँगन मे
या किसी और के आँगन मे

मुकेश इलाहाबादी ------------------








Sunday, 27 May 2012

ठस और बेजान दिनों के बीच

बैठे ठाले की तरंग -------
ठस
और
बेजान
दिनों के बीच
हम
गुज़र रहे हैं
निष्पंद
किसी पत्थर सा
या कि
खौलते
उबलते
दिनों के बीच
पड़े हैं
बिना गले
बिना पके
और फिर ठन्डे हो जायेंगे
पत्थर की तरह
इन्ही
ठस और बेजान दिनों के बीच
उबलते और खौलते दिनों के बीच

मुकेश इलाहाबादी -----------------

परिंदों के शहर में करूं मै उड़ान की बातें

बैठे ठाले की तरंग -----------------

परिंदों  के  शहर  में  करूं  मै  उड़ान  की  बातें
दोस्तों की महफ़िल में दुनिया ज़हान की बातें

यायावरी  में काट दी,अपनी सारी ज़िन्दगी अब
क्यूँ    करूं  अपने घर  और  मकान  की  बातें

बहुत  उदास  उदास है  अपने  शहर  का  मौसम
  कुछ  देर  छेड़ें  हंसी  और  मुस्कान की बातें

यूँ  तो  लड़ने  झगड़ने  की अपनी  फितरत नहीं
गर बात पड़े तो करूं मै तीरों कमान की बातें

इंसान की शिराओं में बह रहा  है बाज़ार चार सूं
ग़ज़ल छोड़ क्यूँ करूं मै नफ़ा नुक्सान की बातें

मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

Friday, 25 May 2012

संबंधों के कैक्टस

बैठे ठाले की तरंग ------------
उग आये हैं
दिल के गमले में
संबंधों के कैक्टस
पानी नहीं
रेत उलीचता हूँ
फूल नही
कांटे उगाता हूँ
फूल सा उग के क्या होगा  ?
कांटो सा उग के देर तक रहूँगा
मुकेश इलाहाबादी -------------