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Sunday, 31 January 2016

यूँ बेवज़ह फिरा न करो

यूँ  बेवज़ह फिरा न करो
सबसे तुम मिला न करो
लोग मसल देंगे, तुमको
फूल सा यूँ खिला न करो
इस राह में बहुत कांटे हैं
यूँ नंगे पाँव चला न करो
बेवज़ह बदनाम कर देंगे
बात बेबात हंसा न करो
बातोँ का जादूगर है, तुम  
मुकेश से मिला न करो

मुकेश इलाहाबादी --------

Friday, 29 January 2016

रेगिस्तान


सुमी,
तुमने कभी रेगिस्तान देखा है ?
रेत ही रेत।
रेत के सिवा कुछ भी नही।
रेत, समझती हो न ?
पत्थर, जो कभी चटटान की तरह खडा रहता है, सदियों सदियों तक, पर धीरे धीरे आफताब की तपिश और बारिश व तूफान से टूट - टूट कर रेजा - रेजा होकर बिखर जाता है। तब वही पत्थर रेत का ढेर कहलाता है, और जब पूरा का पूरा पहाड़ रेजा - रेजा बिखर जाता है, तो वह रेगिस्तान कहलाता है।

उसी रेगिस्तान को कभी गौर से देखना, जो दिन में आग सा दहकता और रात में बर्फ सा ठंड़ा होता है। जिसके सीने पर मीलों तक सन्नाटा पसरा रहता है, मौत सा गहरा सन्नाटा। जिसमें साथ देने के लिये पहाड़ों कि तरह चीड़ व चिनार के दरख्त नही होते। खूबसूरत लहलहाते फूल के गुच्छे नही होते। दिल की गहराइयों तक उतर जाने वाले ठंडे़ पानी के चष्में नही होते। झील व कलकल करती नदियां नही होती।
वहां जंगल में नाचने वाले मोर और कूकने वाली कोयल भी नही होती।
शेर व चीता जैसे चिंघाड़ने वाले जानवर भी नही होते। यहां तक कि मासूस शावक व फुदकती हुयी गिलहरी भी नही होती।
और ,,,,,, न ही होती है मीलों तक एक के पीछे एक कतार से चलने वाली चींटियां।

ऐसा ही एक रेगिस्तान मेरे अंदर भी फैेला है। जिसमें हरियाली के नाम पर छोटी - छोटी अपने आप उग आने वाली कंटीली झाड़ियां है या फिर अक्सर और दूर दूर पर दो दो चार चार की संख्या में खुरदुरे तने वाले ताड़ या कहो खजूर के पेड़ होते है। जिनकी जड़ों में पानी देने के लिये कोई नहर या झरना नही बहता। खाद व पानी देने के लिये कोई इंसान नही होता। फिर भी ये शान से और पूरी अलमस्ती से खड़े रहते है। बिना किसी शिकवा शिकायत के अपने उपर नुकीली पत्तियों का छाता सा लगाये।
जानती हो। एसे बीराने मरुस्थल में ये दरख्त कैसे जिंदा रहते हैं।
तो सुनो !
जब कभी कोई बदरिया अपने ऑचल के सारे जल को किसी पहाड़ या तराई पे बरसा के या कहो लुटा के फिर से सागर की ओर जा रही होती है। और उसका रहा सहा जलकण सूरज भी सूख चुका होता है। उसी छूंछे बादलों से ये पेड़ सूरज की रोशनी से ही कुछ जल चुरा लेते हैं। और फिर शान से जिंदा ही नही रहते बल्कि अपने अंदर भी मीठा - मीठा जीवन रस पैदा करते और संजोते रहते हैं।
यही रस रात भर ऑसू की तरह बहते रहते हैं, चुपके चुपके धीरे धीरे ताकि किसी को एहसास न ही उनकी बीरानी का उनकी तंहाई का। लेकिन जमाने वाले उसे भी हंड़िया में बूंद - बूंद भर लेते हैं, और सुबह पीते हैं जिसे ताड़ी कहते हैं। और जानती हो ? उस ताड़ी में हल्का - हल्का मीठा - मीठा सा नशा  होता है। जो धूप चढ़ने के साथ साथ और भी ज्यादा बढ़ता जाता है। इसके अलावा ये दरख्त उसी जल कणों से खजूर जैसे मीठे फल भी उगा लेते हैं। ये सीधे पर थोडे़ से तिरछे खड़े होकर किसी थके व तपे मुसाफिर को घनी छांह भले न दे पाते हों पर वे ताड़ी जैसा नषीला पेय और खजूर सा मीठा अम्रततुल्य फल जरुर देते हैं जो इस रेगिस्तान के मुसाफिरों के लिये वरदान है।
बस इसी तरह मै भी अपनी महबूबा और चाहने वालों से दूर चाहे कितनी दूर रहूं। पर उनकी यादों और फोन कॉलों से प्रेमरस खींचता रहता हूं और जिंदा रहता हूं।
लिहाजा मेरी बातों को ताड़ी और कविताओं को खजूर जानो।
बाकी तो एक पहाड़ हूं जो टूट - टूट कर रेजा - रेजा बिखर चुका है किसी रेगिस्तान की तरह।

मुकेश इलाहबदी --------------------------------------

Thursday, 28 January 2016

तुम जहाँ कहीं भी हो,

जब,
रिश्तों के
ताने बाने बिखर हों
ज़िंदगी
महज़ तनहाई
और सुबहो शाम की
आवारगी रह गयी हो
आफ़ताब
दूर कहीं उफ़ुक पे
मुँह छुपा
सिसक रहा हो
ऐसे वक़्त मे
मेरी अंजुरी में
इक चाँद उगा
जिसमे
चंदन की खुशबू
और रूहानी ठंडक थी
जिसे पाकर मै
बहुत खुश था
चाँद भी मेरी अंजुरी में
खुश था
मै अंजुरी संभाले संभाले
ज़ीस्त के ऊबड़ खाबड़ रास्ते में
चला जा रहा था
चला जा रहा था
न जाने कब
दहकते आसमान से
एक बाज ने झपट्टा मारा
और मेरी हथेली से
मेरे चाँद को ले कर
उड़ गया
दूर गगन में न जाने कहाँ
तब से भटक रहा हूँ
इस बियाबान में
अपने चाँद के लिए

( सुमी , तुम जहाँ कहीं भी हो,
खबर करना, मै तुम्हे उस बाज़
के पंजो से छुड़ाने आऊंगा ज़रूर
ज़रूर - एक दिन, सुन रही हो न मेरे सुमी )

मुकेश इलाहबदी -------------------------

काश कोई सन्नाटा बाँट लेता

काश कोई सन्नाटा बाँट लेता
मेरा दर्द मेरा दुखड़ा बाँट लेता

कुछ देर को  हंस लेता मै  भी
एक  आध लतीफा  बाँट लेता

कब से अँधेरे मे बैठा हूँ, काश
कोई,ये घना अँधेरा बाँट लेता

इंसां के बस में नहीं था वरना
चाँद - तारे आसमा बाँट लेता

ज़माने में कोई भूखा न रहता
गर इंसान निवाला बाँट लेता

सिर्फ इक मसीहा था, मुकेश
वो अकेला क्या -२ बाँट लेता

मुकेश इलाहाबादी -------------

'सूफ़िया'

जब, रिश्तों के ताने बाने बिखर रहे हों ज़िंदगी महज़ भाग दौड़ रह गयी हो आफ़ताब दूर कहीं उफ़ुक पे मुँह छुपा सिसक रहा हो ऐसे वक़्त में भी कुछ लोग दिए सा जल कर दूसरों के लिए आफ़ताब बनते हैं खुद फूल सा खिलते हैं खुशबू बांटते हैं ऐसी ही एक खुशबू एक आफताब जिसमे सूरज सी रोशनी और चाँद सी रूहानी ठंडक और ख़ूबसूरती है जिसे ज़माना 'सूफ़िया' कहता है जिसका नाम ही नहीं तबियत भी 'सूफ़ियाना ' है अभिनय और मॉडलिंग में आसमान छुआ है आज उसी का जन्म दिन ज़माना मना रहा है ऐसे प्यारे दोस्त को जन्म दिन की ढेरों ' शुभकामनाएँ ' ढेरों बधाइयाँ खुदा करे हमारा ये दोस्त ये गौरव सालों साल जब तक कि ये फ़लक पे महफूज़ हैं ज़मीन अपनी धूरी पे नाच रही है तब तक इस दोस्त की सूफ़िया की हंसी क़ायम रहे वे सदा ज़माने को अपने कामो से अपनी मुहब्बत से रौशन करती रहें - ढेरों ढेरों ढेरों बधाइयाँ - शुभकामनाएँ राजीव श्रीवास्तव -----------------------

Wednesday, 27 January 2016

जब तक मै रहूंगा ‘आदम’ और तुम ‘ईव’

सुमी,
ये तो सच है
जब तक मै रहूंगा ‘आदम’
और तुम ‘ईव’
तब तक हम खाते रहेंगे ‘सेब’
भोगते रहेंगे नर्क
इससे तो बेहतर है
मै बन जाउं जंगल
घना ओर बियाबान
तुम बहो उसमे
नदी सा हौले - हौले
या फिर मै
टंग जाउं आसमान मे
चॉद सा
और तुम बनो
मीठे पानी की झील
सांझ होते ही मै
उतर आउं जिसमे
चुपके से,
सुबह होते ही फिर
टंग जाउूं आसमान मे
या तो,
ऐसा करते हैं
मै बन जाता हूं आंगन
जिसमे तुम उग आओ
तुलसी बन के
या फिर तुम
बन जाओ
धरती और मै
बन जाउं बादल
और तुझसे मिलने आउं
सावन भादों मे
झम झमा झम झम

मुकेश इलाहाबादी ...



Tuesday, 26 January 2016

नजरिया - अपना अपना

नजरिया - अपना अपना

एक तितली
निगाह में थी
फूल के
वो आयी,
बैठी भी
फिर
उड़ गयी

(तितलियाँ एक फूल पे
कब बैठीं ?)


कली देख
भौंरा खुश हुआ
कई चक्क्र लगाए
कली मुस्कुराई
इठलाई
भौंरे के बैठते ही
खिल के फूल बनी
हवा के संग संग डोलने लगी
अभी वह खुश भी न हो पाई थी
भौंरा उड़ चूका था
एक और
मुस्कुराती कली की और

(भौंरे कब किसे कली या फूल के हुए हैं ?)

मुकेश इलाहबदी ----------