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Monday, 27 May 2019

रास्ते तो हैं मगर दुश्वारियां बहुत हैं

रास्ते तो हैं मगर दुश्वारियां बहुत हैं
इश्क़ की राह मे रूसवाईयां बहुत हैं

बड़े हो गए उड़ गए सब परिंदे
घर मे मेरे अब तन्हाईयाँ बहुत है

ज़माने की जुबाँ pe ज़हर रख गया कोई
लोगों की बातों मे तल्खीयां बहुत है

सुनते रहो मुझे राह कट जाएगी
सुनाने को मेरे पास कहानियां बहुत हैं

मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,

Friday, 3 May 2019

तुम्हारा मुस्कुराना

तुम
मुस्कुराती हो तो
लगता है जैसे किसी ने
तपती
हुई देहं में
लेप दिया हो 
चन्दन का लेप

इस लिए तुम्हारा मुस्कुराना
मेरे जलते हुए वज़ूद के लिए बहुत ज़रूरी है
बहुत ज़रूरी

मुकेश इलाहाबादी ---------------------

Tuesday, 30 April 2019

तुम्हारे प्यार में हूँ

मै
तुम्हारे प्यार में हूँ
या मै तुम्हे प्यार करता हूँ
हो सकता है दोनों बातें एक ही लगती हो
पर ऐसा मै नहीं समझता
क्यों कि तुम्हारे प्यार में होने का अर्थ है
तुम मेरे और मै तुम्हारे स्वाभाव में शामिल हूँ
मेरे पास कोइ ऑप्शन नहीं है
और न कोई इक्षा तुमसे अलग होने की
जब कि प्यार करने का अर्थ हुआ
मै वो कर रहा हूँ जो मेरा स्वाभाव नहीं है
यानि ऑप्शन मौजूद है
किसी और को चाहने या न चाहने का

इस लिए अब मै  ये नहीं कहूंगा
मै तुम्हे प्यार करता हूँ

बल्कि कहूंगा -
मै तुम्हारे प्यार में था
तुम्हारे प्यार में हूँ
और तुम्हारे प्यार में रहूंगा

क्यूँ समझ रही हो न ? मेरी सुमी

मुकेश इलाहाबादी ----------------
या मै तुम्हे प्यार करता हूँ
हो सकता है दोनों बातें एक ही लगती हो
पर ऐसा मै नहीं समझता
क्यों कि तुम्हारे प्यार में होने का अर्थ है
तुम मेरे और मै तुम्हारे स्वाभाव में शामिल हूँ
मेरे पास कोइ ऑप्शन नहीं है
और न कोई इक्षा तुमसे अलग होने की
जब कि प्यार करने का अर्थ हुआ
मै वो कर रहा हूँ जो मेरा स्वाभाव नहीं है
यानि ऑप्शन मौजूद है
किसी और को चाहने या न चाहने का

इस लिए अब मै  ये नहीं कहूंगा
मै तुम्हे प्यार करता हूँ

बल्कि कहूंगा -
मै तुम्हारे प्यार में था
तुम्हारे प्यार में हूँ
और तुम्हारे प्यार में रहूंगा

क्यूँ समझ रही हो न ? मेरी सुमी

मुकेश इलाहाबादी ----------------

Sunday, 28 April 2019

नम्र तो हैं पर मग़रूर बहुत हैं

नम्र तो हैं पर मग़रूर बहुत हैं
लोग यहाँ के मशरूफ बहुत हैं

जिस्म तो पास पास हैं मगर
दिल इक दूसरे से दूर बहुत हैं

रूह पे गर्द की परत दर परत
चेहरे पे बनावटी नूर बहुत हैं

मुकेश इलाहाबादी -------------

Friday, 26 April 2019

मेरे घर में भी एक चिड़िया है

मेरे
घर में भी  एक चिड़िया है
कुछ
काली कुछ भूरी
आँखों वाली चिड़िया
जो हर वक़्त उड़ती फिरती है
पूरे घर में
कभी बेड रूम - कभी ड्राइंग रूम
कभी बॉलकनी तो कभी किचन
अक्सर जब वो उड़ -उड़ के थक चुकी होती है
तब आते ही
मेरे  कंधे पे अपनी चोंच रख के
आँखों को नचाती  है
न जाने क्या -क्या इशारे करती है - कहती है
सुनती है तब मै सिर्फ और सिर्फ
उस चिड़िया को मन्त्र बिद्ध सा देखता हूँ
कुहकते हुए 
और उस की आँखों की भाषा अपनी हथेली से
समझने के लिए 
उसे सहलाता हूँ
तो  वह 
हंसती हुई फिर से
फुर्र - फुर्र उड़ जाती है
अक्शर किचन में ही उड़ के जाती है 

और तब  मै मुक्सुराता हुआ - चाय के इंतज़ार में होता हूँ

मुकेश इलाहाबादी --------------------------

Tuesday, 16 April 2019

रीढ़

मैंने
शायद ही कभी
अपने पिता की रीढ़ को
सीधी और तनी देखा है
सिवाय खाट पे सीधे लेटने  के
बाकी हमेसा झुके हुए ही पाया
कभी ज़िम्मेदारियों के बोझ से
कभी महंगाई के बोझ से
तो कभी बड़ी होती पुत्रियों और
बेरोज़गार पुत्र को देख कर
कई बार खीझ भी जाता
पिता सीधे और तन के क्यों नहीं चलते
किन्तु पिता सिर्फ मुस्कुरा के रह जाते
और कुछ न कहते

पर मेरी भी रीढ़ उस दिन थोड़ा झुक गयी
जिस दिन बाप बना
बाकी उस दिन झुक गयी जिस दिन 
जिस दिन पिता की अर्थी उठाई थी

और अब मै भी झुकी रीढ़ का हो गया हूँ

और अब मेरा बेटा मेरे सामने तन के चलता है
सीधी रीढ़ से

मुकेश इलाहाबादी --------------------

नीम की पत्ती

मीठे
शब्दों की चासनी में
अपने स्वार्थ को नहीं परोसने से बेहतर 
मै बना रहना चाहता हूँ
कड़वी नीम की पत्ती
भले तुम उसे थोड़ा चबा के थूंक दो
पर जिसकी तासीर तो तुम्हारे लिए
स्वास्थ्य वर्धर्क तो होगी

अब ये तुम्हे तय करना है
तुम्हे क्या पसंद है 

मुकेश इलाहाबादी --------------------