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Tuesday, 24 February 2026

धरती गोल थी, दृष्टि नहीं

 धरती गोल थी, दृष्टि नहीं


धरती सदियों से गोल थी

अपने अक्ष पर घूमती,

सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती,

समुद्रों को बाँहों में थामे।


पर दृष्टि

सीधी रेखाओं में सोचती रही।


उसने क्षितिज को अंत समझा,

और जहाँ पानी मिला

वहाँ डर।

जहाँ नया तट दिखा

वहाँ दावा।


धरती ने कभी नहीं कहा

“यह मेरा है।”

पर दृष्टि ने कहा

“यह अब मेरा होगा।”


गोलाई में कोई कोना नहीं होता,

पर नज़र ने कोने बना लिए

पूर्व, पश्चिम,

हम, वे।


धरती जोड़ती रही

महाद्वीप कभी एक थे,

नदियाँ सीमाओं से बेख़बर रहीं,

हवा ने कभी पासपोर्ट नहीं माँगा।


पर दृष्टि ने नक्शे बनाए

सीधी रेखाएँ,

कठोर सीमाएँ,

रंगों से बाँटे हुए हिस्से।


धरती घूमती रही

उसी धैर्य से,

उसी संतुलन से।

पर दृष्टि

अपनी धुरी पर अटकी रही।


उसे लगा

कि खोज लेना ही जान लेना है,

कि नाम दे देना ही अधिकार है।


धरती गोल थी

इसलिए हर यात्रा

किसी न किसी मोड़ पर

लौट सकती थी।


पर दृष्टि

लौटना नहीं जानती थी।

वह आगे बढ़ना जानती थी

भले ही आगे

किसी और का घर हो।


आज भी

जब हम आकाश से

धरती की तस्वीर देखते हैं,

वह एक नीला गोला लगती है

निर्विवाद, अविभाजित।


तब समझ आता है

समस्या भूगोल की नहीं थी,

दृष्टि की थी।


धरती गोल थी,

इसलिए उसमें मिलन की संभावना थी।

दृष्टि सीधी थी,

इसलिए उसमें टकराव की।


शायद अगली खोज

किसी नए तट की नहीं,

एक नई दृष्टि की हो

जो गोलाई को समझे,

और स्वीकार करे

कि इस ग्रह पर

केंद्र कोई एक नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

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