समय के तलवे पर लिखा नाम
समय के तलवे पर
किसका नाम लिखा था
पता ही नहीं चला,
पर उसकी आहट
हर पल की रेखाओं में सुनाई देती रही।
कभी वो धूप की तरह चमका,
कभी रेत की तरह फिसल गया,
पर मिटा नहीं
जैसे किसी रूह की पुकार
किसी अनजाने सफ़र से लौटती हो।
समय चलता रहा,
पर नाम वही रहा
एक मौन स्मरण की तरह,
एक अधूरी दुआ की तरह,
या शायद एक ऐसी कहानी की तरह
जिसे सिर्फ़ रूहें पढ़ना जानती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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