मैं, उम्मीद और सुबह की रौशनी
मैं बैठा हूँ उस खिड़की के पास,
जहाँ पहली किरणें धीरे-धीरे छूती हैं ज़मीन को।
उम्मीद मेरे दिल में जागती है,
जैसे सुबह अपने हाथों में प्यार की रौशनी लिए आती हो।
हर नई सुबह एक नई कहानी कहती है,
हर किरण एक नर्म एहसास जगाती है।
मैं अपनी आँखों में तेरी झलक खोजता हूँ,
और पाता हूँ कि तुम वहाँ नहीं हो,
लेकिन तुम्हारा असर हर रोशनी में है।
उम्मीद मेरे भीतर फूलों की तरह खिलती है,
और मैं मुस्कुराता हूँ
क्योंकि जानता हूँ,
हर अंधेरी रात के बाद
रौशनी हमें जोड़ती है,
और अधूरी ख्वाहिशें भी पूरा होने लगती हैं।
मैं, उम्मीद और सुबह की रौशनी
तीनों मिलकर एक रूहानी संगीत बनाते हैं,
जहाँ सिर्फ प्यार, विश्वास और नए सपनों की सरगम होती है।
और मैं खड़ा हूँ,
तैयार हर नए सूरज का स्वागत करने को,
ताकि तेरी यादों की रौशनी
मेरे हर दिन को रोशन कर सके।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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