जब लड़कियाँ रिश्तों में माँ जैसी होने लगती हैं…
तो वे शिकायतें कम और समझ ज़्यादा करने लगती हैं।
हर बार खुद को पीछे रख
दूसरों की थकान का हिसाब रखने लगती हैं —
किसे चाय चाहिए,
कौन चुप है,
किसकी आँखों में आज कुछ कहना छुपा है।
जब लड़कियाँ रिश्तों में माँ जैसी होने लगती हैं,
तो वे उम्र से बड़ी हो जाती हैं।
चाहे खुद बच्ची ही क्यों न हों,
पर अपनों की परवाह
उन्हें माँ की तरह सोने नहीं देती।
वे नज़रों से दिल का हाल जानने लगती हैं,
और आवाज़ से मन की थकन।
उनकी गोद तकिया बन जाती है,
और हथेली — बिना कहे सहला देने वाली दवा।
वे खाना परोसते वक़्त पूछती नहीं,
बस थाली में वो रखती हैं
जो तुम्हारे मन ने भी ठीक से नहीं चाहा था।
उनकी आँखों में डाँट नहीं होती,
पर जो कहा नहीं गया,
वो भी समझा जाता है।
जब लड़कियाँ रिश्तों में माँ जैसी होने लगती हैं,
तो उन्हें भी किसी की गोद चाहिए होती है,
पर वे माँ बनते-बनते
कभी बेटी रह ही नहीं पातीं।
और फिर एक दिन,
जब सब कह देते हैं —
"तेरे बिना तो घर अधूरा है…"
तो वे मुस्कुराती हैं,
पर कोई नहीं देखता
कि वो कब से ख़ुद के लिए ‘घर’ ढूँढ रही हैं।
मुकेश ,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment