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Wednesday, 25 February 2026

छिन्नमस्ता : रक्त की धारा में छिपा प्रकाश

 छिन्नमस्ता : रक्त की धारा में छिपा प्रकाश

वह खड़ी है श्मशान-संध्या में

वज्र-सी नग्न,

पर भय नहीं,

एक प्रखर शून्य की दीप्ति।


स्वयं का ही शीश

स्वयं के करों में—

यह आत्म-विनाश नहीं,

अहं-विच्छेद का महामंत्र है।


कंठ से फूटती तीन रक्त-धाराएँ

एक स्वयं के मुख में,

दो शिष्या-शक्ति के अधरों पर

प्राण का परिपूर्ण परिभ्रमण।


यहाँ मृत्यु पोषण है,

वियोग ही संयोग का मूल।

रक्त—काम नहीं केवल,

चेतना का अग्नि-तत्व है।


वह रति और काम के युग्म पर आरूढ़

संदेश स्पष्ट

ऊर्जा को दबाओ मत,

उसे रूपांतरित करो।


छिन्नमस्ता कहती है—

सृष्टि की जड़ काम है,

पर मोक्ष का द्वार

उसी ऊर्जा का रूपांतरण।


शीश-विच्छेद का रहस्य—

मस्तिष्क की सीमाओं से परे जाना,

तर्क के पार,

सीधे अनुभव की बिजली में प्रवेश।


तंत्र की भाषा में—

कुण्डलिनी का आकस्मिक उत्कर्ष,

सहस्रार में रक्त-रश्मि का विस्फोट।


वह भयानक नहीं,

अत्यंत करुणामयी है

जो स्वयं को अर्पित कर

जगत को पोषित करती है।


उसकी मुस्कान में

संहार नहीं,

एक शोध-दीप जलता है

कि जीवन और मृत्यु

दो नहीं हैं।


छिन्नमस्ता—

जहाँ भय ज्ञान में गलता है,

और रक्त की प्रत्येक बूँद

बोध का अक्षर बन जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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