एक सुलगी हुई रात और वो
एक सुलगी हुई रात थी
नीम अँधेरे में लिपटी,
जैसे चुपचाप कोई राज़ कहने को हो
पर कह न पाए।
और वो थी
बिलकुल पास,
धड़कनों की आवाज़ सुनाई देती थी
या शायद अपनी नहीं,
उसकी सुन रहा था।
उसके बाल बिखरे थे
जैसे रात खुद उसके कंधों पर सो गई हो,
और आँखें
जैसे बुझती लौ में भी
कुछ जलता रह गया हो।
उसने धीमे से पूछा
"तुम जाग रहे हो?"
मैंने मुस्कराकर कहा
"हाँ, तुम्हें महसूस कर रहा हूँ।"
वो चुप रही,
जैसे सिगरेट की तरह —
सुलगती, बुझती,
पर पूरी तरह खत्म नहीं होती।
हमने कोई शेर नहीं पढ़ा उस रात,
ना ही कोई फिल्म दोहराई,
बस लम्हों की राख
और साँसों की चुप्पियाँ थीं।
वो मेरे पास थी,
पर जैसे खुद से भी दूर
जैसे कोई अधूरी कहानी
जो खत्म होने से डरती हो।
एक सुलगी हुई रात थी
और वो भी थी,
धुएँ जैसी
छू के निकल जाने वाली,
पर असर छोड़ जाने वाली।
और मैं…
अब भी उसी रात में हूँ —
जहाँ सिर्फ एक सिगरेट नहीं,
एक लड़की सुलग रही थी
मेरी यादों की तीलियों पर।
मुकेश ,,,,,,,,
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