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Sunday, 22 February 2026

धुएँ में घुलती आत्मा

 धुएँ में घुलती आत्मा


धुएँ की एक लहर उठती है

जैसे कोई स्मृति हो

भीगी पलकों से फिसलती हुई

किसी मौन तपस्वी की तरह।

वो बैठी थी मेरे सामने,

हाथ में सिगरेट नहीं,

पर मेरी आदतों की राख

उसकी आँखों में सुलग रही थी।

मैं हर कश के साथ

उसे थोड़ा-थोड़ा भूलना चाहता था,

पर हर धुएँ का छल्ला

उसकी आँखों का वृत्त बन जाता।

तन्हाई ने तपश्चर्या की,

प्रेम ने परीक्षा ली,

और मेरी आत्मा

धुएँ में घुलती रही...

बिना किसी स्वाहा के।

कभी वो मुझसे कहती थी,

"सांस मत खींचो, श्वास लो..."

मुझे तब शास्त्र याद नहीं आते थे,

सिर्फ उसके होंठ—जो मुझे माया से मोक्ष तक खींचते।

सिगरेट जलती रही

जैसे कोई जीवन का चक्र,

हर राख में छुपी थी

कर्मों की कोई जली हुई कहानी।

मैंने प्रेम में मोह देखा,

और तन्हाई में आत्मा,

और फिर जाना 

प्रेम अगर गहराता है

तो विरक्ति की गंध भी साथ लाता है।

अब मैं नहीं जलाता सिगरेट

पर कभी-कभी ध्यान में

उसका चेहरा

धुएँ की तरह उभरता है

क्षण भर के लिए

फिर… राख में विलीन हो जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,


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