मैं, यादें और अधूरी बातें
मैं बैठा हूँ खामोशियों के उस शहर में,
जहाँ तेरी हँसी अभी भी गूंजती है,
पर हवा में तेरे शब्द नहीं,
सिर्फ यादें हैं, बिखरी हुई,
जैसे रात की चाँदनी किसी टूटे हुए शीशे में चमकती हो।
मैंने तेरे नाम की ख्वाबों में सांस ली,
हर लम्हा, हर सिहरन, हर जज़्बात
तेरे बिना अधूरे रहे।
कभी कोई जमीं नहीं थी,
कभी कोई आसमान नहीं था,
सिर्फ वो गली थी,
जहाँ हम मिलते थे… और कभी लौटकर नहीं जाते।
यादें, वे धीरे-धीरे फूल बनकर खिलती हैं,
और कांटों में घुलकर दर्द दे जाती हैं।
मैंने उन्हें संभाला,
जैसे कोई साधक अपने तपस्वी ध्वनि को पकड़ता है,
लेकिन वे फिसलती रेत की तरह
हाथ से छूट जाती हैं।
और मैं…
मैं अब भी उन अधूरी बातों का पुल बना रहा हूँ,
जो हम कभी कह न सके।
हर साँस में तेरी कमी,
हर ख्वाब में तेरी झलक,
और हर सुबह में वही पुरानी तन्हाई।
लेकिन फिर भी,
मैं मुस्कुराता हूँ,
क्योंकि मैं जानता हूँ
तेरी यादें मुझे जीने की वजह देती हैं,
और अधूरी बातें मुझे तेरे करीब रखती हैं,
रूह के उस कोने में,
जहाँ सिर्फ हम हैं,
और सिर्फ हमारे खामोश लम्हे हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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