“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
ये आख़िरी वाला मेरी तरह टूटा था..."
और मैं
कुछ कहे बिना
उसी टूटी हुई रेखा में
उसका नाम पढ़ता
वो
हवा में
शून्य में
या मेरी किसी भूली-बिसरी नज़्म में
विलीन हो जाती
और मैं...
बस राख झाड़ता रहता
अपनी उँगलियों से
या शायद यादों से।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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