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Tuesday, 24 February 2026

निगाह-ए-ख़ामोश का सर्र-ए-इश्क़

 निगाह-ए-ख़ामोश का सर्र-ए-इश्क़ 

(मौन दृष्टि का प्रेम-रहस्य)


जब वो ख़ामोश निगाहों से देखती है,

तो फ़लक अपनी रौशनी समेट कर

उसकी आँखों में उतर आता है।

न कोई सदा, न कोई सरगोशी

बस एक सुकूत,

जिसमें क़ायनात की धड़कन सुनाई देती है।


उसकी नज़र,

जैसे किसी दरवेश की दुआ,

बे-आवाज़ मेरे वजूद पर उतरती है

और मैं

अपने ही अंदर

एक और आलम की दहलीज़ पा लेता हूँ।


वो कुछ कहती नहीं,

मगर उसकी पलकों की हर जुंबिश

आयत-ए-मोहब्बत बन जाती है;

उसकी ख़ामोशी में

रब का कोई सर्र छुपा होता है

जो सिर्फ़ दिल की ज़बान समझती है।


जब उसकी निगाह ठहरती है,

तो वक़्त सज्दा करता है;

लम्हे तस्बीह की मानिंद

एक-एक कर गिरते हैं,

और रूह

अपने जिस्म की क़ैद भूल जाती है।


मैंने देखा है

उसकी आँखों में

शब-ए-तारीक भी नूर बन जाती है;

और दिल का हर ज़ख़्म

ज़िक्र में बदल जाता है।


वो देखती है

तो ऐसा लगता है

जैसे मैं नहीं रहा,

बस एक एहसास है

जो उसके और मेरे दरमियान

बे-नाम सफ़र करता है।


उसकी निगाह

इश्क़ नहीं, इबादत है;

रूह का वो मुक़ाम

जहाँ अल्फ़ाज़ गुम हो जाते हैं

और सिर्फ़ यक़ीन बाक़ी रहता है।


अगर कभी

तुमने किसी को

ख़ामोशी में दुआ देते देखा हो

तो समझ लेना,

वो उसकी आँखों का असर था।


क्योंकि कुछ नज़रें

दीदार नहीं करतीं

फ़ना कर देती हैं।


और जो एक बार

उस फ़ना में उतर जाए,

वो फिर

अपने होने का दावा नहीं करता

बस इश्क़ का राज़

सीने में लिए

ख़ामोश मुस्कुराता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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