लघु उपन्यास – दूसरा खंड
अध्याय – 1 : जब किताबों से लोग बाहर आते हैं
रात पढ़ी गई
माण्डूक्य उपनिषद की प्रति
सिरहाने पड़ी थी।
खुली।
औंधी।
और मैं—
एक साथ
जाग्रत,
स्वप्न
और
तुरीय में था।
कमरे में हल्की-सी नीली रोशनी थी।
टेबल लैम्प बुझ चुका था,
पर खिड़की से आती भोर की हवा
किताबों के पन्नों को धीरे-धीरे हिला रही थी।
तख़्त पर पड़ी किताबों का ढेर
अचानक
मुझे साधारण काग़ज़ नहीं लगा।
जैसे उनमें
किसी और समय के लोग
अब भी सांस ले रहे हों।
तभी मैंने देखा—
अलमारी के पास
हल्की-सी धुंध उठ रही है।
और उस धुंध के भीतर से
कोई आकृति बाहर आ रही है।
धीरे-धीरे
वह स्पष्ट हुई।
छितरी हुई
बेतरतीब दाढ़ी।
सादा यूनानी ट्यूनिक।
नंगे पाँव।
वह कमरे में टहल रहे थे।
मैंने उन्हें पहचान लिया।
वह थे
Socrates।
उनके चारों ओर
कुछ लोग खड़े थे।
जैसे किसी पुराने एथेंस की गली में
एक छोटा-सा दार्शनिक जमावड़ा हो।
सॉक्रेटीस
अपने धीमे और शांत स्वर में
कुछ समझा रहे थे।
उनकी आँखों में
अजीब-सी चमक थी।
वह कह रहे थे
“मनुष्य का सबसे बड़ा कार्य
अपने आप को जानना है।”
फिर उन्होंने ज़मीन पर
नंगे पाँव टहलते हुए कहा—
“लोग दुनिया के बारे में बहुत जानते हैं
पर अपने भीतर
कभी झाँकते ही नहीं।”
उनके पीछे
एक युवा खड़ा था।
चेहरे पर तेज़।
आँखों में बेचैनी।
वह ध्यान से सुन रहा था।
मैंने उसे भी पहचान लिया।
वह था
Plato।
वह अभी युवा था।
उसने यूनानी ट्यूनिक पहनी हुई थी
और हाथ में एक पुस्तक थी।
सॉक्रेटीस
फिर बोले
“सच्चा ज्ञान
नैतिकता से अलग नहीं होता।
जो स्वयं को जान लेता है
वह अन्याय नहीं कर सकता।”
यह कहते हुए
उन्होंने जैसे पूरे कमरे की ओर देखा।
मुझे लगा
जैसे वह मुझसे भी पूछ रहे हों—
“क्या तुम स्वयं को जानते हो?”
इतने में
प्लेटो आगे बढ़ा।
उसके चेहरे पर
उत्साह था।
उसने अपनी जेब से
एक किताब निकाली।
उसके मुखपृष्ठ पर लिखा था—
The Republic
प्लेटो ने कहा—
“गुरुजी,
यदि मनुष्य स्वयं को जान ले
तो समाज भी बदल सकता है।”
उसने किताब का पन्ना खोला।
फिर जोश से बोला—
“पर एक न्यायपूर्ण समाज
तभी बनेगा
जब राज्य का संचालन
दर्शन समझने वाले लोग करें।”
सॉक्रेटीस
हल्का-सा मुस्कुराए।
धुंध उनके चारों ओर
थोड़ी गहरी हो गई।
जैसे वह धीरे-धीरे
किसी और समय में लौट रहे हों।
प्लेटो बोलता रहा
“इसलिए
दार्शनिक को सिर्फ़ सोचना नहीं चाहिए।
उसे समाज भी बनाना चाहिए।
एक ऐसा राज्य
जहाँ न्याय
सबसे ऊँचा सिद्धांत हो।”
कमरे में
अब अजीब-सा दृश्य था।
एक तरफ
सॉक्रेटीस का शांत प्रश्न—
“स्वयं को जानो।”
दूसरी तरफ
प्लेटो का स्वप्न—
“न्यायपूर्ण राज्य बनाओ।”
और मैं
अपने छोटे से कमरे में बैठा
यह सब देख रहा था।
पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था।
खिड़की से आती हवा
माण्डूक्य उपनिषद के पन्नों को हिला रही थी।
और मुझे अचानक लगा—
यह कमरा
अब सिर्फ़ कमरा नहीं रहा।
यह
सभ्यताओं का मिलन स्थल बन गया है।
एक तरफ
यूनान के दार्शनिक।
और सिरहाने
शांत पड़ी
माण्डूक्य उपनिषद।
जैसे दो अलग सभ्यताएँ
एक ही प्रश्न पूछ रही हों—
मनुष्य कौन है?
इतने में
सॉक्रेटीस ने प्लेटो की ओर देखा।
और धीरे से कहा—
“याद रखो,
किसी भी राज्य से पहले
मनुष्य का मन ठीक होना चाहिए।”
प्लेटो कुछ क्षण चुप रहा।
और उसी क्षण
कमरे की धुंध
थोड़ी और फैल गई।
मुझे लगा
शायद अब
किसी और किताब से
कोई और दार्शनिक
बाहर आने वाला है।
और कमरा
एक बार फिर
एक नई बातचीत के लिए तैयार हो रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment