लघु उपन्यास
भाग – 26 : कर्फ़्यू, चाय का पैन और दो दर्शन
कर्फ़्यू को कई दिन हो गए हैं।
सब्ज़ी, राशन और परचून की दुकानें
लगातार बंद पड़ी हैं।
बाहर की दुनिया अब
आवाज़ों से पहचानी जाती है
पुलिस वालों के बूटों की ठक-ठक,
कभी-कभी गुजरती पुलिस जीप का सायरन,
और सड़क पर
इधर-उधर घूमते आवारा कुत्ते।
कभी-कभी
कोई भिखारी दिखाई दे जाता है।
या कोई पागल।
आज सुबह
मैं थोड़ी देर के लिए बाहर निकला था।
गली के मोड़ पर
शांति पगलिया खड़ी थी।
बाल पूरे बिखरे हुए,
आँखों में अजीब-सी चमक।
वह “ही-ही” करके हँस रही थी।
किसी ने उसे
एक बासी पाव दे दिया था।
वह उसे हवा में दिखाती जा रही थी
और अपने उलझे बालों को
लगातार खुजला रही थी।
जैसे दुनिया की सबसे बड़ी दौलत
उसी के हाथ में हो।
थोड़ा आगे
गुमटी वाला बाबा बैठा था।
वह पुलिस वालों का दोस्त है।
कर्फ़्यू में भी
उसकी छोटी-सी चाय की गुमटी खुली रहती है।
पुलिस वाले भी वहीं से चाय पीते हैं।
वह मुझे जानता है।
कभी-कभी
मैं उसे फोन कर देता हूँ।
वह चुपचाप
कुछ खाने का सामान दे जाता है।
आज भी
वह मैगी बनाकर दे गया था।
कह रहा था—
“बाबूजी, जब तक कर्फ़्यू है
इसी से काम चलाइए।”
दूध वाला भी
सुबह-सुबह
चुपके से दूध रख गया था।
मकान मालिक
आजकल अपने कमरे में ही रहते हैं।
कभी-कभी
चुपचाप नीचे आ जाते हैं।
पर आज नहीं आए।
और
मुर्गी वाला—
कई दिनों से
दिखाई ही नहीं दिया।
कमरे में लौटकर
मैंने चारों तरफ देखा।
मेरे कमरे के सभी बर्तन
खामोश पड़े थे।
सिर्फ़ चाय का पैन
और गैस स्टोव ही
दिन में दो बार हरकत में आते हैं।
सुबह चाय बनाते समय।
और शाम को।
बाकी सब
जैसे मौन साधे हुए हैं।
कभी-कभी
बस एक चीज़
मेरी खामोशी में साथ देती है
सिगरेट की डिब्बी।
वह बिना कुछ कहे
मेरे पास पड़ी रहती है।
तख़्त पर
ढेर सारी किताबें पड़ी हैं।
पर आज
पता नहीं क्यों
पश्चिम का दर्शन पढ़ने का मन नहीं था।
पश्चिमी दर्शन
अक्सर तर्क और वितर्क में उलझ जाता है।
वह प्रश्न पूछता है,
बहुत गहराई से पूछता है—
पर कई बार
मन और बुद्धि के पार
नहीं ले जा पाता।
मैंने एक किताब उठाई
फिर वापस रख दी।
वह थी
Friedrich Nietzsche
पर आज उसका भी मन नहीं हुआ।
फिर मैंने सोचा
आज नहीं।
आज कुछ और।
मैंने तख़्त से
एक पतली-सी पुरानी किताब उठाई
माण्डूक्य कारिका।
इसके रचयिता हैं
Gaudapadacharya।
यह छोटी-सी पुस्तक
पर भीतर
एक पूरा ब्रह्मांड छुपा है।
यह बताती है
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे
एक चौथी अवस्था भी है
तुरिय।
जहाँ मन नहीं पहुँचता।
जहाँ तर्क भी थम जाता है।
मैंने किताब खोली।
और अचानक लगा—
पश्चिमी दर्शन
मानो एक लंबी बहस है।
और यह ग्रंथ
एक गहरा मौन।
बाहर शहर में
दंगे की आग है।
अंदर
कमरे में
एक आदमी बैठा है
और माण्डूक्य कारिका पढ़ रहा है।
पंखा धीरे-धीरे घूम रहा है।
चाय का पैन
गैस स्टोव पर चुप पड़ा है।
सिगरेट की डिब्बी
मेरी तरफ देख रही है।
और मुझे अचानक लगा—
शायद सभ्यता
दो हिस्सों में बंटी है।
एक हिस्सा
बाहर सड़कों पर लड़ रहा है।
और दूसरा हिस्सा
किसी छोटे-से कमरे में बैठकर
अब भी पूछ रहा है—
मैं कौन हूँ?
पन्ना पलटते समय
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
शांति पगलिया
अब भी दूर खड़ी थी।
वह बासी पाव को
धीरे-धीरे खा रही थी।
और मुझे अचानक लगा
कभी-कभी
पागल लोग भी
हमसे ज़्यादा शांति में होते हैं।
कमरा फिर शांत हो गया।
और माण्डूक्य कारिका का एक वाक्य
धीरे-धीरे मेरे भीतर उतरने लगा—
“न कोई जन्म है, न कोई विनाश।”
बाहर
कर्फ़्यू अब भी लगा था।
पर भीतर
कमरा
धीरे-धीरे
ध्यान में उतर रहा था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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