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Sunday, 15 March 2026

लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 - अध्याय 10 : नदी से पहले का सत्य

 लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 - अध्याय 10 : नदी से पहले का सत्य


रात की यात्राओं में एक विशेष प्रकार की निस्तब्धता होती है।

दिन की हलचल धीरे-धीरे पीछे छूट जाती है और मन अपने भीतर उतरने लगता है।

ट्रेन अब मध्य भारत के किसी शांत प्रदेश से गुजर रही थी।

डिब्बे की अधिकांश लाइटें बंद हो चुकी थीं।

कहीं-कहीं धीमी रोशनी में लोग सो रहे थे, और खिड़कियों के बाहर अंधकार के बीच कभी-कभी किसी छोटे स्टेशन की पीली रोशनी अचानक प्रकट होकर फिर पीछे छूट जाती।

नील ऊपर की बर्थ पर सो चुका था।

अस्तित्व खिड़की के पास बैठा था।

साक्षी सामने की सीट पर थी।

वह जाग रही थी—लेकिन उसकी आँखों में वह स्थिरता थी जो केवल जागने से नहीं आती, बल्कि भीतर किसी गहरे विचार से आती है।

कुछ देर तक दोनों चुप रहे।

फिर साक्षी ने अचानक पूछा

“क्या तुम्हें कभी ऐसा लगा है कि कुछ लोग हमारे जीवन में बहुत देर से आते हैं?”

अस्तित्व ने उसकी ओर देखा।

“देर से?”

“हाँ,” उसने धीरे से कहा,

“जैसे उन्हें बहुत पहले मिलना चाहिए था… लेकिन वे किसी कारण से बहुत बाद में मिलते हैं।”

अस्तित्व ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“शायद इसलिए कि जब हम तैयार नहीं होते, तब जीवन हमें कुछ नहीं देता।”

साक्षी ने सिर हिलाया।

“या शायद इसलिए कि हम किसी और समय में पहले ही मिल चुके होते हैं।”

उसका यह वाक्य हवा में कुछ क्षण ठहरा रहा।

अस्तित्व ने महसूस किया—यह केवल एक दार्शनिक वाक्य नहीं था।

इसके पीछे कोई स्मृति छिपी थी।

“तुम कुछ कहना चाहती हो?” उसने धीरे से पूछा।

साक्षी कुछ क्षण चुप रही।

फिर उसने अपने बैग से एक छोटी-सी पुरानी नोटबुक निकाली।

उसके पन्ने हल्के पीले पड़ चुके थे।

“यह मेरी डायरी नहीं है,” उसने कहा,

“यह मुझे मेरे नाना के घर से मिली थी।”

अस्तित्व ने उत्सुकता से उसकी ओर देखा।

“इसमें कुछ पुराने नोट्स हैं… और एक अजीब-सी बात भी।”

उसने डायरी का एक पन्ना खोला।

अस्तित्व ने झुककर देखा।

पन्ने पर किसी ने बहुत पहले कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं—

“एक दिन तुम उस नदी के किनारे जाओगे

जहाँ तुम्हें लगेगा कि तुम पहले भी आ चुके हो।

वहाँ तुम्हें वह व्यक्ति मिलेगा

जो तुम्हारी यात्रा को समझता है।”

अस्तित्व कुछ क्षण उस पंक्ति को देखता रहा।

“यह किसने लिखा?” उसने पूछा।

साक्षी ने धीरे से कहा

“मेरे नाना ने।”

“पर इसमें तो…”

“हाँ,” साक्षी ने उसकी बात पूरी की,

“इसमें वही नदी लिखी है जिसके बारे में हमने सपना देखा था।”

ट्रेन की गति स्थिर थी, लेकिन उस क्षण अस्तित्व को लगा जैसे समय ठहर गया हो।

“क्या तुम्हारे नाना उस जगह गए थे?” उसने पूछा।

साक्षी ने सिर हिलाया।

“मुझे नहीं पता।

उन्होंने कभी इस बारे में कुछ नहीं बताया।”

कुछ क्षण चुप्पी रही।

फिर अस्तित्व ने धीरे से पूछा—

“तुमने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

साक्षी ने खिड़की से बाहर अंधेरे में देखते हुए कहा—

“क्योंकि मैं खुद समझना चाहती थी कि यह केवल संयोग है…

या वास्तव में कोई संकेत।”

उसी समय ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर धीमी हो गई।

बाहर कुछ लोग खड़े थे, कुछ चाय की दुकानें, और ठंडी रात की हवा।

फिर ट्रेन आगे बढ़ गई।

अस्तित्व ने डायरी की ओर फिर देखा।

उसके भीतर एक नया प्रश्न जन्म ले रहा था।

क्या यह संभव है कि उनकी यात्रा केवल उनके निर्णय का परिणाम नहीं है?

क्या यह संभव है कि किसी और समय में—किसी और व्यक्ति ने—इस यात्रा का संकेत पहले ही छोड़ दिया था?

साक्षी ने डायरी बंद कर दी।

“कल सुबह हम नर्मदा के पास पहुँच जाएँगे,” उसने कहा।

अस्तित्व ने धीरे से पूछा

“और अगर वह जगह सचमुच हमारे सपने जैसी हुई?”

साक्षी ने उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में इस बार हल्की-सी चमक थी।

“तब हमें यह मानना पड़ेगा,” उसने कहा,

“कि कुछ यात्राएँ हम नहीं चुनते…”

“…वे हमें चुनती हैं।”

ट्रेन रात के अंधकार में आगे बढ़ती रही।

पर अब उस यात्रा का अर्थ बदल चुका था।

अब यह केवल एक नदी की खोज नहीं थी।

यह शायद उस अदृश्य सूत्र की खोज थी

जो समय, स्मृति और चेतना को

एक ही कहानी में जोड़ देता है।

और सुबह…

जब सूरज उगेगा

वे पहली बार

उस नदी को देखेंगे

जो उनके सपनों में पहले ही बह चुकी थी।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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