लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी -भाग – 3 -अध्याय 5 : वह सपना जो दोनों ने देखा
रात के दस बज चुके थे।
पुस्तक मेले की अधिकांश भीड़ अब लौट चुकी थी।
कुछ स्टॉल वाले अपने काउंटर समेट रहे थे, कुछ लेखक अब भी अंतिम पाठकों से बातचीत में लगे थे।
लाइटें जल रही थीं, पर उनमें अब दिन जैसी चहल-पहल नहीं थी
जैसे किसी उत्सव के बाद बची हुई रोशनी।
अस्तित्व, साक्षी और नील धीरे-धीरे मुख्य द्वार की ओर चल रहे थे।
नील रास्ते भर हल्की-फुल्की बातें करता रहा
नई किताबों, लेखकों और आने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों के बारे में।
पर अस्तित्व का मन कहीं और था।
साक्षी के साथ हुई वह लाइब्रेरी वाली साझा स्मृति अभी भी उसके भीतर गूँज रही थी।
कुछ दूर जाकर नील को अचानक किसी परिचित का फ़ोन आया।
वह रुक गया।
“आप लोग चलिए, मैं दो मिनट में आता हूँ,” उसने कहा।
अस्तित्व और साक्षी आगे बढ़ गए।
रात की हवा हल्की ठंडी थी।
मेले के बाहर सड़क के किनारे पेड़ों की लंबी छायाएँ फैली हुई थीं।
कुछ क्षण दोनों चुप चलते रहे।
फिर साक्षी ने अचानक कहा
“अस्तित्व… एक और बात है जो मैं तुम्हें बहुत दिनों से बताना चाहती थी।”
अस्तित्व ने उसकी ओर देखा।
“कौन-सी बात?”
साक्षी ने थोड़ी देर तक कुछ नहीं कहा।
जैसे वह यह तय कर रही हो कि यह बात कहनी भी चाहिए या नहीं।
फिर उसने धीमे स्वर में कहा—
“तुम्हें कभी कोई सपना बार-बार आया है?”
अस्तित्व हल्के से मुस्कराया।
“मनुष्य को सपने तो आते ही रहते हैं।”
साक्षी ने सिर हिलाया।
“नहीं… मेरा मतलब वह सपना
जो सालों तक बार-बार लौटता रहे।”
अस्तित्व का ध्यान अब पूरी तरह उसकी ओर था।
“हाँ,” उसने धीरे से कहा,
“ऐसा एक सपना मुझे कई सालों से आता है।”
साक्षी ने तुरंत पूछा—
“कैसा?”
अस्तित्व कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने बहुत धीमे स्वर में कहना शुरू किया—
“मैं एक लंबी सड़क पर चल रहा होता हूँ।
सड़क के दोनों तरफ़ बहुत पुराने पेड़ होते हैं।
आगे कहीं दूर एक नदी बह रही होती है।
और नदी के किनारे…
एक छोटा-सा पत्थर का घाट होता है।”
साक्षी की चाल अचानक धीमी हो गई।
अस्तित्व ने आगे कहा—
“वहाँ कोई खड़ा होता है।
मैं उसे साफ़ नहीं देख पाता।
बस इतना महसूस होता है कि वह व्यक्ति
मेरी प्रतीक्षा कर रहा है।”
साक्षी अब बिल्कुल रुक चुकी थी।
अस्तित्व ने उसकी ओर देखा।
उसके चेहरे पर हल्का-सा विस्मय था।
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
साक्षी ने बहुत धीरे से कहा—
“क्योंकि मुझे भी…
लगभग यही सपना आता है।”
अस्तित्व ने पहली बार पूरी तरह रुककर उसकी ओर देखा।
“क्या?”
साक्षी ने धीरे-धीरे कहा—
“मैं भी उसी सड़क पर चल रही होती हूँ।
दोनों तरफ़ पुराने पेड़।
आगे नदी।
और नदी के किनारे पत्थर का छोटा-सा घाट।”
अस्तित्व के भीतर एक हल्की-सी सिहरन उठी।
साक्षी ने आगे कहा—
“और वहाँ…
कोई खड़ा होता है।
जिसे मैं साफ़ नहीं देख पाती।”
कुछ क्षण दोनों के बीच गहरी खामोशी रही।
रात की हवा पेड़ों की पत्तियों को हल्का-हल्का हिला रही थी।
दूर सड़क पर कुछ गाड़ियाँ गुजर रही थीं।
अस्तित्व ने धीरे से पूछा—
“और तुम्हें क्या लगता है…
वह कौन है?”
साक्षी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“पहले मुझे नहीं पता था।
पर पिछले कुछ महीनों से
जब भी वह सपना आता है…”
वह कुछ क्षण के लिए रुक गई।
फिर बहुत शांत स्वर में बोली—
“तो मुझे लगता है कि वह तुम हो।”
अस्तित्व ने गहरी साँस ली।
अब यह केवल एक संयोग नहीं लग रहा था।
पहले साझा स्मृति,
अब लगभग एक जैसा सपना।
यह सब इतना साधारण भी नहीं था कि इसे तुरंत किसी तर्क से समझाया जा सके।
तभी पीछे से नील की आवाज़ आई—
“अरे! आप लोग यहाँ खड़े-खड़े दर्शन कर रहे हैं क्या?”
वह तेज़ क़दमों से उनके पास आ गया।
“चलो, बाहर टैक्सी मिल जाएगी।”
अस्तित्व और साक्षी फिर चलने लगे।
पर अब दोनों के भीतर एक नया प्रश्न जन्म ले चुका था।
क्या यह संभव है कि
दो लोगों की चेतना
किसी अदृश्य स्तर पर
एक ही अनुभव साझा कर रही हो?
या यह सब केवल मन की एक गहरी संरचना है—
जहाँ दो समान संवेदनाएँ
एक ही तरह के सपने रच देती हैं?
मुख्य द्वार सामने दिखाई देने लगा।
मेले की अंतिम लाइटें भी धीरे-धीरे बुझने लगी थीं।
अस्तित्व ने पीछे मुड़कर उस रोशन परिसर को देखा।
उसे अचानक याद आया
पहले भाग में साक्षी ने उससे एक बार कहा था:
“कुछ मुलाक़ातें जीवन में इसलिए होती हैं
क्योंकि वे पहले से ही हमारे भीतर लिखी होती हैं।”
उस समय उसने उस वाक्य को केवल एक सुंदर विचार समझा था।
पर आज…
उसे लग रहा था
शायद वह विचार
किसी गहरी सच्चाई की ओर इशारा कर रहा था।
रात और गहरी हो चुकी थी।
पर कहानी की यात्रा अभी बस एक नए मोड़ पर पहुँची थी।
क्योंकि अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि
अस्तित्व और साक्षी कौन हैं।
अब प्रश्न यह था
क्या मनुष्य की चेतना
कभी-कभी दो शरीरों में
एक ही कहानी लिख सकती है?
और शायद…
उस प्रश्न का उत्तर
अभी आने वाले दिनों में
धीरे-धीरे खुलने वाला था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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