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Sunday, 15 March 2026

लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 -अध्याय 8 : नदी का वास्तविक स्थान

 लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 -अध्याय 8 : नदी का वास्तविक स्थान


मीरा से हुई बातचीत के बाद अस्तित्व लंबे समय तक खिड़की के पास खड़ा रहा।

सुबह अब पूरी तरह जाग चुकी थी।

सड़क पर लोगों की आवाजाही बढ़ गई थी, दुकानों के शटर खुल रहे थे, और हवा में चाय की उबलती भाप की हल्की-सी गंध तैर रही थी।

पर उसके भीतर अभी भी रात की वह रहस्यमयी शांति बनी हुई थी।

टेबल पर रखी डायरी उसे बार-बार अपनी ओर खींच रही थी।

अस्तित्व ने उसे फिर से खोला।

वही पन्ना…

वही सपना…

वही नदी और पत्थर का घाट।

उसने धीरे-धीरे उस दृश्य को अपने मन में फिर से बनाने की कोशिश की।

लंबी सड़क…

दोनों तरफ़ पुराने पेड़…

आगे बहती नदी…

और उसके किनारे पत्थरों से बना एक छोटा-सा घाट।

अचानक उसके मन में एक विचार कौंधा।

क्या यह केवल एक प्रतीक है?

या सचमुच कहीं ऐसा स्थान मौजूद हो सकता है?

उसने तुरंत अपना लैपटॉप खोला।

कई वर्षों से वह भारत के विभिन्न नगरों, घाटों और तीर्थस्थलों पर लिखी किताबें पढ़ता आया था।

उसे नदी के घाटों की संरचनाएँ, पुराने नगरों की बनावट, और उन स्थानों की ऐतिहासिक स्मृतियाँ हमेशा आकर्षित करती रही थीं।

उसने कुछ चित्र देखने शुरू किए।

गंगा के घाट…

नर्मदा के किनारे बने पुराने सीढ़ीनुमा घाट…

कहीं-कहीं पेड़ों से घिरे छोटे-छोटे पत्थर के घाट।

वह लगातार तस्वीरें देखता रहा।

अचानक उसकी उँगलियाँ रुक गईं।

स्क्रीन पर जो चित्र था, उसे देखकर वह कुछ क्षण तक स्थिर रह गया।

एक पुराना घाट।

पत्थरों की छोटी-सी सीढ़ियाँ।

किनारे पर झुके हुए बहुत पुराने पेड़।

और सामने बहती शांत नदी।

यह दृश्य बिल्कुल वैसा तो नहीं था जैसा उसके सपने में आता था—

पर उसमें एक अजीब-सी समानता थी।

उसने तस्वीर को और ध्यान से देखा।

नीचे लिखा था

“नर्मदा के किनारे — एक पुराना घाट, मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे के पास।”

अस्तित्व ने गहरी साँस ली।

नर्मदा…

उसे अचानक याद आया

बहुत साल पहले अनिरुद्ध ने उसे नर्मदा के किनारे बने कुछ शांत घाटों के बारे में बताया था।

वहाँ भीड़ नहीं होती,

बस नदी, पेड़ और पत्थर की सीढ़ियाँ।

उसने उसी समय साक्षी को संदेश भेजा।

“क्या तुम्हें अपने सपने की नदी कभी किसी वास्तविक जगह जैसी लगी?”

कुछ ही मिनट में उत्तर आया।

“कभी-कभी…

मुझे लगता है कि वह किसी बड़ी नदी की तरह है।

शांत… चौड़ी…

जैसे समय धीरे-धीरे बह रहा हो।”

अस्तित्व ने तुरंत अगला संदेश लिखा—

“अगर मैं कहूँ कि शायद वह जगह सचमुच मौजूद है?”

कुछ क्षण तक कोई उत्तर नहीं आया।

फिर साक्षी का संदेश आया

“तुम क्या कहना चाहते हो?”

अस्तित्व ने स्क्रीन पर उस घाट की तस्वीर भेज दी।

कुछ देर तक साक्षी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

जैसे वह उस तस्वीर को ध्यान से देख रही हो।

फिर अचानक उसका संदेश आया

“अजीब बात है…”

अस्तित्व ने पूछा—

“क्या?”

उत्तर आया—

“मुझे ठीक-ठीक नहीं पता क्यों…

पर इस जगह को देखकर मुझे वही सपना याद आ गया।”

अस्तित्व की उँगलियाँ कुछ क्षण के लिए कीबोर्ड पर स्थिर रह गईं।

अब यह केवल कल्पना नहीं रह गई थी।

एक सपना,

एक साझा स्मृति,

और अब एक वास्तविक स्थान।

उसने धीरे से लिखा

“अगर हम वहाँ जाकर देखें तो?”

इस बार उत्तर आने में थोड़ा समय लगा।

जैसे साक्षी इस विचार को गंभीरता से सोच रही हो।

फिर स्क्रीन पर उसका संदेश उभरा

“शायद हमें जाना चाहिए।”

अस्तित्व ने लैपटॉप बंद कर दिया।

कमरे में फिर वही शांत वातावरण फैल गया।

कभी-कभी जीवन में ऐसे क्षण आते हैं

जब कोई निर्णय बहुत बड़ा नहीं लगता—

पर वही निर्णय आगे चलकर पूरी कहानी की दिशा बदल देता है।

अस्तित्व ने खिड़की से बाहर देखा।

सूरज अब ऊपर आ चुका था।

शहर पूरी तरह जाग चुका था।

पर उसके भीतर एक नई यात्रा की शुरुआत हो रही थी—

एक ऐसी यात्रा

जो शायद केवल एक नदी तक पहुँचने की नहीं थी।

वह शायद उस प्रश्न तक पहुँचने की यात्रा थी

जो बहुत पहले उसके भीतर जन्मा था

क्या मनुष्य की चेतना

कभी-कभी अपने उत्तरों को

दूसरे मनुष्यों के रूप में खोजती है?


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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