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Sunday, 8 March 2026

ख़ुद से भागता हुआ आदमी

 ख़ुद से भागता हुआ आदमी


ख़ुद से भागता हुआ आदमी

अक्सर भीड़ में छिप जाता है,

ताकि उसकी चुप्पी

किसी की नज़र में न आए।


वह शहरों की रोशनी में

अपने अँधेरे को दबा देता है,

और शोर के बीच

अपने भीतर की आवाज़

सुनने से बचता रहता है।


कभी काम में,

कभी रिश्तों में,

कभी सपनों के बहाने

वह हर रास्ते पर दौड़ता है

सिवाय उस रास्ते के

जो भीतर की ओर जाता है।


पर एक सच है

दुनिया की कोई भी दूरी

इतनी लंबी नहीं होती

कि आदमी

अपने आप से बच सके।


क्योंकि

हर शाम जब आईना

थोड़ा और साफ़ हो जाता है,

तो उसमें वही चेहरा दिखता है

जिससे वह

पूरी ज़िंदगी भागता रहा।


और तब समझ आता है

भागना दुनिया से नहीं था,

भागना तो

अपने ही सच से था।


और आदमी

जब अपने ही सच से भागता है,

तो रास्ते चाहे जितने बदल ले,

मंज़िल

हमेशा वही रहती है—

ख़ुद का सामना


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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