ब्रह्मांड की रसायनशाला
ब्रह्मांड
एक विशाल रसायनशाला है
जहाँ प्रयोगशाला-कोट नहीं,
निहारिकाएँ पहनी जाती हैं।
प्रथम क्षणों में
ऊर्जा ने पदार्थ का रूप लिया,
क्वार्क जुड़े,
प्रोटॉन और न्यूट्रॉन बने
यह था प्रारंभिक संश्लेषण,
जब समय स्वयं
एक अभिक्रिया-पात्र था।
कुछ ही मिनटों में
हाइड्रोजन और हीलियम की रचना हुई—
ब्रह्मांडीय मूल-घोल।
पर तत्वों का विस्तृत परिवार
अभी शेष था।
तारों ने
अपनी दहकती भट्टियों में
संलयन की क्रिया चलाई
हाइड्रोजन से हीलियम,
हीलियम से कार्बन,
और आगे…
जब तक लोहा
स्थायित्व की सीमा बनकर न उभरा।
पर लोहे के बाद
ऊर्जा नहीं मिलती
तब तारा
सुपरनोवा बनकर फटता है।
उस विस्फोट में
सोना, चाँदी, यूरेनियम
दुर्लभ तत्व जन्म लेते हैं।
यह रसायनशाला
संतुलन और असंतुलन का खेल है।
ताप, दाब, घनत्व—
तीनों मिलकर
अस्तित्व के सूत्र गढ़ते हैं।
निहारिकाएँ
मिश्रण-पात्र हैं,
जहाँ तारकीय धूल
फिर से संयोजित होती है।
नए तारे,
नए ग्रह,
नए यौगिक।
किसी छोटे-से ग्रह पर
पानी स्थिर हुआ,
कार्बन-श्रृंखलाएँ बनीं,
एमिनो अम्ल जुड़े
और रसायन
धीरे-धीरे जीवविज्ञान में बदल गया।
इस प्रकार
हमारा शरीर
एक जटिल यौगिक है
ब्रह्मांड की दीर्घ अभिक्रियाओं का परिणाम।
हमारे भीतर की कोशिकाएँ
उसी प्राचीन प्रयोग की
चलती-फिरती शीशियाँ हैं।
ब्रह्मांड की रसायनशाला
अब भी सक्रिय है।
हर तारा
एक नई अभिक्रिया,
हर विस्फोट
एक नया सूत्र।
और हम
उन अनगिनत प्रयोगों की
जीवित परिभाषा।
यह प्रयोग समाप्त नहीं हुआ;
अभी भी
तत्व मिल रहे हैं,
रूप बदल रहे हैं,
और सृष्टि
अपना अगला यौगिक
तैयार कर रही है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
व्वाहहहहह
ReplyDeleteशानदार
वंदन
व्वाहहहह
ReplyDeleteशानदार
वंदन
बहुत सुंदर
ReplyDeleteसृष्टि
ReplyDeleteअपना अगला यौगिक
तैयार कर रही है।
यकीनन यह अनवरत प्रक्रिया है ये हम पर है कि हम इसका उपयोग कैसे करते हैं
सुन्दर रचना