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Saturday, 7 March 2026

मनुष्य और ब्रह्मांड का मौन संबंध

मनुष्य और ब्रह्मांड का मौन संबंध

रात के आकाश में

जब मनुष्य

पहली बार तारों को देखता है,

तो उसे लगता है

कि वह ब्रह्मांड से अलग है।


पर धीरे-धीरे

विज्ञान और ध्यान

दोनों एक ही बात कहते हैं

कि यह दूरी

सिर्फ़ दृष्टि का भ्रम है।


मनुष्य का शरीर

उसी तारकीय धूल से बना है

जिससे आकाशगंगाएँ बनीं।


हमारी हड्डियों का कैल्शियम,

रक्त का लोहा,

और श्वास की ऑक्सीजन

कभी किसी तारे के

हृदय में जली हुई अग्नि थी।


इस अर्थ में

मनुष्य केवल पृथ्वी का नहीं,

ब्रह्मांड का

एक चलती-फिरती स्मृति है।


ऋषियों ने इसे

दूसरे शब्दों में कहा—

“यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे।”


अर्थात

जो बाहर है

उसका प्रतिरूप

भीतर भी है।


ब्रह्मांड में

ग्रह अपनी कक्षाओं में घूमते हैं,

और मनुष्य के भीतर

विचार और भावनाएँ

अपनी-अपनी कक्षाओं में।


वहाँ गुरुत्व है,

यहाँ आकर्षण।


वहाँ ऊर्जा का विस्तार है,

यहाँ चेतना का।


दोनों के बीच

कोई शोर नहीं,

कोई संवाद नहीं—

फिर भी

एक गहरा मौन संबंध है।


जब मनुष्य

केवल शरीर से जीता है

तो उसे

पृथ्वी की सीमाएँ दिखाई देती हैं।


पर जब वह

चेतना से देखता है

तो समझ में आता है


कि वह

एक छोटे ग्रह पर खड़ा होकर भी

पूरे ब्रह्मांड का

साक्षी है।


यहीं

मनुष्य और ब्रह्मांड का रहस्य छिपा है


कि अनंत आकाश

किसी दूर जगह पर नहीं,

मनुष्य की चेतना में ही

अपना सबसे गहरा घर बनाता है।


और शायद इसी कारण

तारों को देखते समय

मनुष्य को

एक अजीब-सी आत्मीयता महसूस होती है


जैसे

वह किसी पराये आकाश को नहीं,

अपनी ही

भूली हुई उत्पत्ति को देख रहा हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

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