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Saturday, 7 March 2026

ज्ञान और अज्ञान का ब्रह्मांड

 ज्ञान और अज्ञान का ब्रह्मांड

ब्रह्मांड की शुरुआत में

न कोई किताब थी,

न कोई शब्द,

न कोई सिद्धांत।


सिर्फ़ एक गहरा अंधेरा था—

जिसे शायद

अज्ञान कहा जा सकता है।


पर वही अंधेरा

पूरी तरह खाली नहीं था,

उसके भीतर

एक हल्की-सी चमक छिपी थी—

जैसे किसी प्रश्न की पहली चिंगारी।


यही चिंगारी

धीरे-धीरे

मनुष्य के भीतर जली,


और उसने

आकाश की ओर देखकर पूछा—


“यह सब क्या है?”


यहीं से

ज्ञान की यात्रा शुरू हुई।


एक कण को समझने की कोशिश,

एक तारे को पहचानने की जिज्ञासा,

और

जीवन के अर्थ को जानने की बेचैनी।


ज्ञान

दरअसल

अज्ञान के अंधेरे में

रखी हुई एक छोटी-सी दीपशिखा है।


जितना वह जलता है,

उतना ही

अंधेरे का विस्तार भी दिखाई देने लगता है।


मनुष्य

जब एक रहस्य सुलझाता है,

तो उसके सामने

दस नए रहस्य खड़े हो जाते हैं।


इस तरह

ज्ञान और अज्ञान

दो विरोधी सेनाएँ नहीं हैं,

बल्कि

एक ही ब्रह्मांड के

दो पड़ोसी प्रदेश हैं।


ज्ञान

वह प्रकाश है

जो रास्ता दिखाता है,


और अज्ञान

वह गहराई है

जो प्रश्न पैदा करती है।


अगर अज्ञान न होता

तो जिज्ञासा जन्म ही न लेती,

और अगर ज्ञान न होता

तो जिज्ञासा भटकती रहती।


शायद इसी कारण

ऋषियों ने कहा


ज्ञान

सिर्फ़ जानकारी नहीं,

बल्कि

अज्ञान की सीमा को पहचानने की विनम्रता भी है।


और वैज्ञानिक भी

अपने सबसे बड़े सिद्धांत के बाद

धीरे से यही स्वीकार करते हैं


“हमने थोड़ा-सा जाना है,

और बहुत कुछ अभी बाकी है।”


ब्रह्मांड

शायद इसी संवाद पर टिका है


जहाँ अज्ञान

हर बार एक नया प्रश्न उठाता है,

और ज्ञान

हर बार एक नया दीप जला देता है।


और मनुष्य

इन दोनों के बीच खड़ा

एक जिज्ञासु यात्री है


जो अंधेरे से डरता भी है,

और उसी अंधेरे में

नए प्रकाश की तलाश भी करता है।


शायद

ज्ञान और अज्ञान का ब्रह्मांड

यही है


एक अनंत यात्रा,

जहाँ हर उत्तर

एक नए प्रश्न की शुरुआत बन जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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