मेरी साँसों में अटकी तुम
तुम गई तो
दरवाज़ा बस
हल्के से बंद हुआ,
पर कमरे में
कुछ रह गया था।
हवा में
तुम्हारी खुशबू की
एक महीन-सी लकीर
जैसे कोई याद
धीरे-धीरे तैर रही हो।
मैंने गहरी साँस ली
और लगा
तुम कहीं बाहर नहीं,
यहीं
मेरी साँसों में
अटकी हुई हो।
अब जब भी
हवा का कोई झोंका आता है,
मैं चुपके से
एक और साँस ले लेता हूँ
शायद
तुम फिर से
थोड़ी-सी
मेरे भीतर उतर आओ।
मुकेश ,
सुंदर
ReplyDeleteकिसी का जाना भी जब उसके आने की खबर देने लगे तब तो उससे विरह संभव ही नहीं
ReplyDeletethnx
Deleteसुंदर
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