मेरे लफ़्ज़ों में छुपी तुम्हारी अनकही मौजूदगी
मेरे लफ़्ज़ों में
तुम्हारी एक अनकही मौजूदगी है,
हर हरफ़ के पीछे
तेरा ही कोई राज़ ठहरा है।
मैं कुछ भी लिखूँ
अर्थ तुम्हीं बन जाती हो,
जैसे हर सदा
तुम तक पहुँचने का बहाना हो।
ना ज़िक्र तुम्हारा,
ना इकरार कोई
फिर भी हर पंक्ति में
तुम्हारा ही असर है।
शायद…
मोहब्बत यूँ ही लिखी जाती है
बिना कहे,
किसी के नाम हो जाती है।
मुकेश ,,,,,,
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