“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
दूरी
सिर्फ़ मीलों में नहीं होती,
कभी-कभी
चुप्पियों में भी फैल जाती है।
मैं
इन चुप्पियों को पार करूँगा।
तुम भी
थोड़ी जगह
मेरे लिए बचाकर रखना।
मुकेश ,,,,,,,
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