होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Saturday, 7 March 2026

मौन और शब्द का द्वंद्व

 मौन और शब्द का द्वंद्व

सृष्टि की शुरुआत में

न कोई वाक्य था,

न कोई वर्ण,

सिर्फ़ एक अथाह मौन था—

गहरा, शांत,

और अपने भीतर

अनगिनत संभावनाएँ छिपाए हुए।


उसी मौन की गोद से

एक हल्की-सी लहर उठी,

जैसे शून्य ने

पहली बार स्वयं को सुनना चाहा हो।


वही लहर

धीरे-धीरे

शब्द बन गई।


शब्द ने आँखें खोलीं

और मौन से कहा—


“मैं तुम्हारा विस्तार हूँ,

तुम्हारी छिपी हुई ध्वनि।”


मौन मुस्कुराया,

जैसे किसी ऋषि ने

अपने शिष्य को पहचान लिया हो।


उसने उत्तर दिया


“और मैं तुम्हारी जड़ हूँ,

तुम्हारा पहला और आख़िरी घर।”


तभी से

दोनों के बीच

एक अनंत संवाद चलता रहा है।


शब्द

संसार को आकार देते हैं—

वेदों की ऋचाएँ,

कवियों की पंक्तियाँ,

दार्शनिकों के सूत्र,

और प्रेमियों की फुसफुसाहट।


पर हर शब्द के पीछे

एक मौन छिपा होता है

जो उसे जन्म देता है

और अंत में

उसे अपने भीतर समेट लेता है।


मनुष्य

जब बोलता है

तो शब्दों से पुल बनाता है,

और जब चुप हो जाता है

तो मौन में

उन पुलों का अर्थ खोजता है।


कभी शब्द

सत्य को स्पष्ट करते हैं,

कभी वही शब्द

सत्य को ढक भी लेते हैं।


और तब

मौन धीरे से कहता है—


“जहाँ भाषा थक जाती है,

वहीं से

मेरी यात्रा शुरू होती है।”


ऋषियों की समाधि में

मौन बोलता है,

और कवियों की कविताओं में

शब्द मौन को छूने की कोशिश करते हैं।


शायद इसी कारण

शब्द और मौन

दो विरोधी नहीं हैं


वे

एक ही अनुभव के

दो अलग रास्ते हैं।


शब्द

अनुभव को व्यक्त करते हैं,


और मौन

उसे गहराई देता है।


जब दोनों का संतुलन बन जाता है

तो भाषा भी ध्यान बन जाती है,

और चुप्पी भी

एक गहन संवाद।


तब मनुष्य समझता है


मौन

सिर्फ़ चुप रहना नहीं,

बल्कि वह स्थान है

जहाँ शब्द जन्म लेते हैं।


और शब्द

सिर्फ़ ध्वनि नहीं,

बल्कि वह यात्रा है

जो अंततः

मौन की ओर लौट जाती है।


यही

मौन और शब्द का द्वंद्व है

एक ऐसा द्वंद्व

जो अंत में

एक ही सत्य में बदल जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment