ब्रह्मांड-विज्ञान और वैशेषिक दर्शन : एक शोधात्मक नज़्म
जब मैंने आकाश को देखा
तो वह सिर्फ़ नीला विस्तार नहीं था,
वह एक प्रश्न था
जो कणाद की आँखों से
आज भी झिलमिलाता है।
उन्होंने कहा
जगत द्रव्य है,
द्रव्य परमाणुओं से बना है,
परमाणु नित्य हैं,
संयोग-वियोग ही सृष्टि का व्याकरण है।
और दूर कहीं,
आधुनिक वेधशालाओं में
जब एडविन हबल ने
आकाशगंगाओं को दूर भागते देखा,
तो ब्रह्मांड ने स्वीकार किया—
विस्तार ही उसका स्वभाव है।
यहाँ से नज़्म शोध बन जाती है
वैशेषिक का “परमाणु”
और आधुनिक भौतिकी का “क्वार्क”,
दोनों में एक ही मौन प्रश्न है
क्या अस्तित्व की अंतिम ईंट
वास्तव में अंतिम है?
अल्बर्ट आइंस्टीन ने
समय को लचीला बताया,
गुरुत्व को वक्रता कहा,
और वैशेषिक ने
दिक् और काल को
स्वतंत्र द्रव्य मानकर
पहले ही मानचित्र बना दिया था।
जब स्टीफ़न हॉकिंग
ब्लैक होल के क्षितिज पर खड़े होकर
विकिरण की फुसफुसाहट सुनते हैं,
तो ऐसा लगता है
जैसे संयोग और वियोग का सिद्धांत
घटनाओं के क्षितिज पर
फिर से लिखा जा रहा हो।
वैशेषिक के छह पदार्थ
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय
मानो ब्रह्मांड की वर्गीकरण-तालिका हैं।
आधुनिक विज्ञान भी तो
कण, बल, क्षेत्र, ऊर्जा,
स्पेस-टाइम और अंतःक्रिया
इन्हीं नामों से पुकारता है।
यह नज़्म कहती है
सृष्टि कोई आकस्मिक विस्फोट मात्र नहीं,
वह संबंधों की रचना है।
परमाणु अकेला कुछ नहीं,
संयोग से जगत बनता है।
और जब संयोग टूटता है,
तो प्रलय नहीं
सिर्फ़ पुनर्संयोजन होता है।
क्या “बिग बैंग”
केवल एक महा-संयोग था?
और क्या “प्रलय”
एक वैश्विक वियोग?
कणाद की दृष्टि में
विशेष ही पहचान है
हर कण अद्वितीय है।
क्वांटम सिद्धांत भी तो कहता है
कण की अवस्था
पर्यवेक्षण से बदल जाती है।
तब शोध यह फुसफुसाता है
दर्शन और विज्ञान
दो तट नहीं,
एक ही नदी के
दो विश्लेषण हैं।
ब्रह्मांड-विज्ञान
संख्याओं में बोलता है,
वैशेषिक
तत्त्वों में।
पर दोनों स्वीकारते हैं—
कि अस्तित्व
व्यवस्थित है,
अन्वेषणीय है,
और नियमबद्ध है।
और मैं
इन दोनों के बीच खड़ा
देखता हूँ
कि परमाणु का नृत्य
और आकाशगंगा का घूर्णन
एक ही लय में बंधे हैं।
यह नज़्म निष्कर्ष नहीं देती,
केवल दिशा देती है
कि यदि हम
प्रयोगशाला की रोशनी
और ऋषि की अंतर्दृष्टि
दोनों को साथ रखें,
तो शायद ब्रह्मांड
सिर्फ़ बाहर नहीं,
भीतर भी उद्घाटित होगा।
और तब
वैशेषिक का “विशेष”
और ब्रह्मांड-विज्ञान का “कॉस्मिक माइक्रोवेव”
एक ही सत्य के
दो आयाम प्रतीत होंगे।
शोध चलता रहेगा
जब तक
कण और चेतना
एक ही सूत्र में
स्वयं को पहचान न लें।
मुकेश ,,,,,,,,,
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