किनारे की ख़ामोश मोहब्बत
शाम की हल्की रोशनी में
समुंदर किसी गहरे ख़याल में था,
लहरें धीरे–धीरे
रेत की उँगलियाँ थामकर
फिर लौट जाती थीं।
किनारे पर
सफ़ेद, मटमैला, फेनिल झाग
ऐसे जमा था
जैसे किसी अनकही बात की
थकी हुई साँसें।
एक मछुआरा
अपनी नाव से टिककर बैठा था,
उसकी आँखों में
दूर तक फैला पानी नहीं,
बल्कि कोई पुरानी याद तैर रही थी।
लहरें आतीं
किनारे को छूतीं,
और फिर चुपचाप लौट जातीं,
मानो हर बार
कोई इज़हार अधूरा रह गया हो।
दूर गहराइयों से
एक व्हेल उभरी,
उसकी साँस में
समुंदर की सदियों पुरानी थकान थी,
और उसकी आँखों में
एक लंबी ख़ामोशी।
उसने पल भर
किनारे की ओर देखा
जैसे वह भी समझ रही हो
इस अनकहे रिश्ते को।
तभी मुझे लगा
कि समुंदर और किनारा
दो पुराने आशिक़ हैं
जो सदियों से
एक-दूसरे को छूते हैं,
मगर कभी पूरी तरह
मिल नहीं पाते।
लहरें उनका पैग़ाम हैं,
झाग उनकी थकी हुई आहें,
और हवा
उनकी अधूरी दास्तान सुनाती है।
शायद मोहब्बत का
सबसे सच्चा रूप वही होता है
जहाँ शब्द नहीं होते,
जहाँ शोर नहीं होता,
बस
किनारे की एक लंबी
ख़ामोश मोहब्बत होती है
मुकेश ,,,,,,,,,
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