दोनों की सच्चाई
सुनो,
हर दास्तान में
एक खलनायक गढ़ लेना आसान होता है।
कभी पुरुष,
कभी स्त्री।
कहा गया—
पुरुष की आँखों में बस देह की प्यास है,
उसका प्रेम क्षणिक है,
उसकी निष्ठा मौसम की तरह बदलती है।
पर किसी ने यह भी तो देखा होगा—
कि वही पुरुष
अपनी थकी हुई हड्डियों के साथ
रात-रात भर
एक भविष्य गढ़ता रहा है।
उसने प्रेम किया
तो सिर्फ़ बाँहों में नहीं,
जिम्मेदारियों में किया।
सिर्फ़ चुंबनों में नहीं,
किस्तों में,
कागज़ों में,
घिसते जूतों में किया।
हाँ, वह कम बोलता है—
पर इसका अर्थ यह नहीं
कि वह कम महसूस करता है।
और सुनो,
स्त्री ने जब प्रेम किया
तो उसने सिर्फ़ चेहरा नहीं देखा।
उसने आने वाले बरसों की आहट सुनी,
बच्चों की संभावनाएँ देखीं,
घर की दीवारों का रंग सोचा।
उसने सुरक्षा चाही—
तो क्या यह अपराध है?
उसने स्थिरता तौली—
तो क्या यह प्रेम का अपमान है?
पर सच यह भी है—
कभी-कभी
जब समय ने करवट बदली,
पुरुष की जेब हल्की हुई,
उसकी चमक धुंधली पड़ी—
तो वही प्रेम
धीरे-धीरे फिसल गया।
जैसे किसी ने कहा हो—
“मैं तुम्हें चाहती थी,
पर तुम्हारी मजबूती को भी।”
और पुरुष—
जिसने पूरी त्वरा से प्रेम किया था,
अचानक समझ नहीं पाया
कि उसकी कमज़ोरी
इतनी महँगी क्यों पड़ी।
सुनो,
दोनों ही दोषी नहीं,
दोनों ही निर्दोष भी नहीं।
प्रेम एक सौदा नहीं,
पर उसमें भय शामिल रहता है।
स्त्री का भय—
असुरक्षित भविष्य का।
पुरुष का भय—
अस्वीकृत होने का।
और इन दो भय के बीच
कभी-कभी प्रेम कुचल जाता है।
पर जब कोई स्त्री
पुरुष की टूटन में भी साथ रहती है,
और जब कोई पुरुष
स्त्री की असफलताओं में भी
उसे थामे रहता है—
तब इतिहास चुप हो जाता है।
क्योंकि वहाँ
न देह जीतती है,
न धन,
न शक्ति—
वहाँ बस दो मन
एक-दूसरे के कठिन समय में
रुके रहते हैं।
और शायद
प्रेम की असली परिभाषा
यही ठहराव है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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