स्मृति और विस्मृति की राजनीति
समय
सिर्फ़ बीतता नहीं,
वह अपने पीछे
कहानियों की एक लंबी पगडंडी छोड़ जाता है।
कुछ कदम
इतिहास की किताबों में दर्ज हो जाते हैं,
और कुछ
धीरे-धीरे धूल में दब जाते हैं।
यहीं से
स्मृति और विस्मृति की राजनीति
जन्म लेती है।
स्मृति
वह दीप है
जो अतीत को रोशनी देता है—
वह कहती है,
“जो हुआ, उसे याद रखो
ताकि सत्य जीवित रहे।”
पर विस्मृति
भी एक शक्ति है—
वह फुसफुसाती है,
“सब कुछ याद रखना
कभी-कभी
व्यवस्था के लिए असुविधाजनक होता है।”
इतिहास
सिर्फ़ घटनाओं का संग्रह नहीं,
वह चयन की एक कला भी है।
कौन-सा प्रसंग
पाठ्यपुस्तकों में लिखा जाएगा,
किसका नाम
स्मारकों पर उकेरा जाएगा,
और
किसकी कहानी
खामोशी में खो जाएगी
यह निर्णय
सिर्फ़ समय नहीं करता,
अक्सर
सत्ता भी करती है।
स्मृति
जनता की साँसों में रहती है
लोकगीतों में,
कहानियों में,
और
बुज़ुर्गों की धीमी आवाज़ों में।
विस्मृति
कभी-कभी
आधिकारिक दस्तावेज़ों में उतर आती है
जहाँ कुछ नाम मिटा दिए जाते हैं
और कुछ को
अत्यधिक उजाला दे दिया जाता है।
इस तरह
इतिहास का चेहरा
धीरे-धीरे बदलने लगता है।
पर स्मृति
इतनी आसानी से हारती नहीं।
वह
कभी किसी कविता में लौट आती है,
कभी किसी लोककथा में,
और कभी
किसी भूले हुए शहर के खंडहरों में।
विस्मृति
उसे दबाने की कोशिश करती है,
पर स्मृति
फिर भी
किसी दरार से झाँक लेती है।
यही
उन दोनों का अनंत द्वंद्व है
एक
याद रखने की ज़िद,
दूसरा
भुला देने की व्यवस्था।
शायद
सभ्यता का संतुलन भी
इसी में छिपा है
कि हम
इतना याद रखें
कि अन्याय दोहराया न जाए,
और
इतना भूल सकें
कि घृणा का बोझ
भविष्य को जकड़ न ले।
तभी
स्मृति और विस्मृति
राजनीति का हथियार नहीं,
बल्कि
इतिहास की समझ
और मानवता की परिपक्वता
बन सकते हैं।
क्योंकि
अंततः
समय की अदालत में
सत्य वही है
जो स्मृति की लौ में
जलता भी रहे
और
विस्मृति की धूल से
बार-बार उठता भी रहे।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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