इश्क़ के पार की दुनिया
कहते हैं
इश्क़ ही आख़िरी मंज़िल है
मगर रूह जानती है
कि इसके भी पार
एक और दुनिया होती है।
वो दुनिया
जहाँ मोहब्बत
किसी एक चेहरे की मोहताज नहीं रहती,
जहाँ दिल
किसी एक नाम से नहीं धड़कता।
वहाँ
इश्क़ दरिया नहीं रहता
वो समंदर बन जाता है।
जहाँ
हर रूह
एक ही नूर से रोशन लगती है,
और हर चेहरा
एक ही रहस्य का आईना बन जाता है।
उस मुक़ाम पर
न मिलन की बेचैनी रहती है
न जुदाई का ग़म
बस एक गहरा सुकून होता है।
जैसे दिल
अपने ही अंदर
किसी अनंत रौशनी को
पा गया हो।
सूफ़ी शायद इसी को कहते हैं
वो मुक़ाम
जहाँ मोहब्बत
किसी रिश्ते से आगे बढ़कर
एक इबादत बन जाती है।
और वही
इश्क़ के पार की दुनिया है
जहाँ रूह
आख़िरकार
अपने असली घर की
ख़ामोश रौशनी में
ठहर जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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