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Saturday, 7 March 2026

प्रश्न और उत्तर का अनंत चक्र

  

प्रश्न और उत्तर का अनंत चक्र

मनुष्य की चेतना में

सबसे पहले जो चिंगारी जलती है,

वह

प्रश्न की होती है।


जब आदिम मनुष्य ने

आकाश की ओर देखा होगा,

तारों की अनगिन रोशनी को

रात के सन्नाटे में चमकते पाया होगा

तब

उसके भीतर

पहला प्रश्न जन्मा होगा।


यह संसार क्या है?

यह आकाश क्यों है?

और

मैं कौन हूँ?


प्रश्न

केवल शब्द नहीं होते,

वे

चेतना की बेचैनी होते हैं।


वे

मनुष्य को स्थिर नहीं रहने देते,

उसे

ज्ञान की यात्रा पर भेजते हैं।


हर प्रश्न

एक द्वार खोलता है,

और हर उत्तर

एक नई राह दिखाता है।


पर

यही इस यात्रा का रहस्य भी है


क्योंकि

हर उत्तर के भीतर

एक नया प्रश्न छिपा होता है।


जब विज्ञान ने कहा

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है,

तो यह उत्तर

एक नई जिज्ञासा बन गया


सूर्य किसके चारों ओर घूमता है?

और

यह ब्रह्मांड कहाँ तक फैला है?


दर्शन ने कहा—

मनुष्य चेतना का वाहक है।


पर फिर

एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ—


चेतना क्या है?

क्या वह शरीर की उपज है

या

किसी गहरे ब्रह्मांडीय रहस्य की झलक?


इस प्रकार

प्रश्न और उत्तर

एक वृत्त की तरह चलते हैं।


वे

समाप्त नहीं होते,

बल्कि

एक-दूसरे को जन्म देते रहते हैं।


यही

मानव ज्ञान की असली गति है।


यदि केवल उत्तर ही होते,

तो जिज्ञासा समाप्त हो जाती।


और यदि केवल प्रश्न ही होते,

तो दिशा खो जाती।


इसलिए

ज्ञान का संतुलन

इन्हीं दोनों के बीच बनता है।


प्रश्न

मनुष्य को खोज की ओर ले जाते हैं,

और उत्तर

उसे समझ की रोशनी देते हैं।


पर

सत्य का महासागर इतना विशाल है

कि

हर उत्तर

केवल एक लहर भर होता है।


शायद

प्रश्न और उत्तर का यह अनंत चक्र

यही सिखाता है


कि ज्ञान

कोई अंतिम मंज़िल नहीं,

बल्कि

एक निरंतर यात्रा है।


और इस यात्रा में

मनुष्य का सबसे बड़ा साहस

यह नहीं कि वह हर उत्तर जान ले,


बल्कि यह है

कि वह

हर नए प्रश्न से

डरने के बजाय

उसे

अपनी चेतना का दीपक बना ले


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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