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Monday, 9 March 2026

सुबह – कोहरे में हलवाई की भट्ठी सुलगाता एक बाल मज़दूर

 सुबह – कोहरे में हलवाई की भट्ठी सुलगाता एक बाल मज़दूर


सुबह अभी

पूरी तरह जागी नहीं है,

सड़क पर कोहरा

धीरे-धीरे बिछा हुआ है

जैसे रात ने

अपना आख़िरी ख़त

ज़मीन पर रख दिया हो।


दुकान के सामने

एक छोटी-सी भट्ठी के पास

झुका हुआ है

एक बाल मज़दूर।


उसके हाथ

लकड़ियों को सुलगा रहे हैं,

और हर चिंगारी के साथ

उसकी साँस

धुएँ में घुलती जा रही है।


उसकी उँगलियाँ

अभी खेलने की उम्र में हैं,

पर वे

आग की भाषा

बहुत पहले सीख चुकी हैं।


कोहरे के उस पार

शहर धीरे-धीरे जाग रहा है,

और यहाँ

एक बच्चा

सुबह से पहले ही

दिन की शुरुआत कर चुका है।


भट्ठी की आग

धीरे-धीरे तेज़ हो रही है,

और उसके चेहरे पर

लाल रोशनी पड़ती है

जैसे कोई छोटा-सा सूरज

उसकी हथेलियों में

जल रहा हो।


शायद

उसने भी कभी

स्कूल की घंटी सुनी होगी,

किसी मैदान में

दौड़ने का सपना देखा होगा—

पर अब

उसकी सुबहें

इसी आग के साथ खुलती हैं।


कोहरे के बीच

जब पहली कढ़ाई चढ़ेगी

और जलेबी की खुशबू

हवा में फैलेगी,

तो लोग

बस स्वाद महसूस करेंगे


पर कोई नहीं जानेगा

कि उस मिठास की शुरुआत

एक बच्चे की

धुएँ भरी सुबह से हुई थी।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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