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Friday, 6 March 2026

सिर्फ़ कविता बन जाना चाहता था

 मैंने कलम

कान के पीछे नहीं अटकाई,

न शब्दों का कोई वेश पहना।


न कोई लेख रचा,

न किसी किताब के पन्नों में

अपने लिए अर्थ तलाशे।


मैं रोया भी नहीं,

न ही किसी बुरे ख़्वाब ने

मेरी नींद को छुआ।


डर भी

पहली बार

मेरे दरवाज़े तक नहीं आया।


मैं बस

रात भर

काग़ज़ पर उतरता रहा—

जैसे कोई ख़ामोश नदी

अपने आप बहती रहती है।


क्योंकि वह रात

न उदासी की थी

न ख़ुशी की।


वह बस

एक ऐसी रात थी

जहाँ मन

सिर्फ़ कविता बन जाना चाहता था

(अदनान कफील की एक कविता से  प्रेरित )

मुकेश ,,,,,,,,,,

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