प्रतीक्षा
प्रतीक्षाएँ
घड़ियों से पैदा नहीं होतीं,
दरअसल वे
उम्मीद की कोख से जन्म लेती हैं।
हर प्रतीक्षा का अपना समय होता है,
और हर समय का
अपना खुलना।
साथ बाँध कर लाई गई घड़ी
अक्सर धोखा दे जाती है—
दिल की सुइयाँ
अपने ही ढंग से चलती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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