पत्थर, पीठ और समय
पुरुष
जब जन्म लेता है
तो उसके हिस्से
पीठ आती है
हाथ
दिखाने के लिए होते हैं
पीठ
उठाने के लिए
पत्थर
सबको मिलते हैं
पर
पुरुषों ने
उन्हें
शिकायत में नहीं बदला
वे
पीठ पर रखते रहे
और
समय को
चलने दिया
समय
उनसे आगे नहीं चला
वह
पीठ पर बैठ गया
धीरे
इतना धीरे
कि बोझ
आदत बन गया
पुरुषों ने
हवा से पूछा नहीं—
“तुम्हें कैसा लग रहा है?”
उन्होंने
सिर्फ़ यह जाना
कि हवा
किधर से आती है
महक
दूसरों के लिए छोड़ी
दिशा
अपने लिए रखी
पुरुषों ने
पहाड़ को
अपनी ऊँचाई नहीं माना
उन्होंने
उसे
सहनशक्ति का
परीक्षण समझा
नदियाँ
उनके भीतर भी बहती थीं
पर
वे किनारों की तरह
चुप रहे
ताकि
पानी
अपनी आवाज़
खुद ढूँढ सके
पुरुषों की साँसों से
ग्लेशियर नहीं पिघले
पर
कई जमे हुए डर
पानी हो गए
ब्रह्माण्ड
उनके लिए
रहस्य नहीं था
बल्कि
जिम्मेदारी
इसलिए
उन्होंने
ग्रह नहीं बदले
वे जानते थे—
यही धरती
एकमात्र जगह है
जहाँ
सरसों
पीली होकर
मुस्कुराती है
प्रेम
उनके लिए
उत्सव नहीं
अनुबंध था
बिना दस्तख़त का
बिना गवाह का
पुरुष
पत्थर नहीं बने
बस
पत्थरों के नीचे
पीठ बन गए
और समय—
जिसे कोई नहीं रोक सकता
वह भी
अंत में
उन्हीं के साथ
बैठ गया
क्योंकि
समय भी जानता है
कुछ लोग
चलने के लिए नहीं
ढोने के लिए
जन्म लेते हैं।
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