तुम : मेरे प्रश्नों का उत्तर
बहुत समय तक
मैं प्रश्नों के साथ जीता रहा
जैसे कोई यात्री
अनगिनत रास्तों के बीच
अपनी दिशा खोज रहा हो।
मैंने जीवन से पूछा—
इस यात्रा का अर्थ क्या है?
मैंने समय से पूछा
यह सब कहाँ जाकर ठहरेगा?
उत्तर मिले,
पर अधूरे।
विचार आए,
पर संतोष नहीं मिला।
तब एक दिन
तुम मेरे जीवन में आईं
बिना किसी घोषणा के,
जैसे सुबह
धीरे-धीरे उजाला ले आती है।
और अचानक
मेरे कई प्रश्न
अपना स्वर खोने लगे।
तुम्हारी उपस्थिति
किसी तर्क का उत्तर नहीं थी,
पर एक गहरी शांति थी
जिसमें
प्रश्नों की बेचैनी
धीरे-धीरे पिघल जाती है।
अब भी
जीवन के सारे रहस्य
मुझे समझ नहीं आए हैं,
पर इतना जान लिया है
कि कुछ उत्तर
शब्दों में नहीं मिलते,
वे किसी के होने में मिलते हैं।
तुम्हारे साथ
चलते हुए
लगता है
जैसे जीवन का रास्ता
थोड़ा और स्पष्ट हो गया हो।
और अब
जब भी कोई पूछता है
क्या तुम्हें
अपने प्रश्नों का उत्तर मिला?
मैं मुस्कुरा कर कहता हूँ
हाँ,
वह किसी किताब में नहीं,
मेरे सामने खड़ा है
तुम।
मुकेश ,,,,,,,
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