समुंदर, तिश्नगी, ख़ारापन और तुम
समुंदर की छाती पर
आज हवा कुछ धीमी है,
लहरें भी जैसे
अपने ही शोर से थककर
ख़ामोशी की ओट में बैठ गई हों।
चारों तरफ़ पानी ही पानी है,
मगर अजीब बात है
इतनी वुसअत के बीच भी
एक गहरी तिश्नगी
दिल के किनारों को छूती रहती है।
समुंदर का पानी
होठों तक लाओ तो
ख़ारापन चुभता है,
जैसे किसी पुराने दुख की
अनकही याद।
मैं सोचता हूँ
इतना विशाल समुंदर
इतना बेचैन क्यों है?
हर लहर
किनारे तक भागकर
फिर मायूस क्यों लौट जाती है?
शायद इसलिए
कि समुंदर की गहराइयों में भी
एक अधूरी चाह रहती है
कुछ ऐसा पाने की
जो उसके पास नहीं।
और उसी पल
तुम्हारी याद
हवा में घुल जाती है।
तुम
जिसकी आँखों में
मीठे पानी की नर्मी है,
जिसकी ख़ामोशी में
किसी दूर दरिया की रवानी।
तब समझ में आता है
कि समुंदर का यह सारा ख़ारापन
दरअसल
उसकी तिश्नगी का इज़हार है।
क्योंकि
जब किसी दिल में
बहुत सारा पानी हो
मगर एक ही शख़्स की कमी हो,
तो वह दिल भी
समुंदर बन जाता है
गहरा, बेचैन,
थोड़ा ख़ारा,
और
हर लहर में
बस तुम्हें पुकारता हुआ।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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