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Sunday, 1 March 2026

अधूरापन

 अधूरापन

मैं ख़ाली इसलिए नहीं हुआ

कि मेरे हिस्से कोई साथ नहीं था,

मैं ख़ाली इसलिए हुआ

कि जितना भी साथ था

उसे पूरी तरह जी न सका।


किसी का हाथ थामा तो लगा

उसकी उँगलियों की थरथराहट पढ़ना छूट गया,

किसी की हँसी में शामिल हुआ

तो उसके भीतर की थकान सुनना छूट गया।


कभी देर तलक बातें कीं

तो लगा उसकी खामोशी का मान रखना रह गया,

कभी बस चुपचाप साथ चला

तो लगा दिल का इक़रार करना रह गया।


किसी की आँखों में झाँका

तो अपना चेहरा ही दिखता रहा,

उसकी भीगी पुतलियों में

छुपा समंदर देखना रह गया।


हर बार प्रेम में पूरा उतरना चाहा,

हर बार कोई किनारा अनछुआ रह गया,

और जब वो मुड़कर दूर हुआ

तो देर से समझ आया—

मैंने उसे खोया नहीं,

मैं उसे पूरी तरह पा ही न सका।


शायद प्रेम की यही रीत है—

हम जितना भी दें,

दिल कहता है

कुछ और देना बाकी रह गया।


मुकेश ,,

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