गुब्बारे के लिए मचलता बच्चा
मेले की भीड़ में
रंग-बिरंगे गुब्बारे
आसमान की तरफ़
हल्के-हल्के डोल रहे हैं।
उनके नीचे
एक छोटा-सा बच्चा
अपनी उँगली उठाकर
बार-बार
उन्हीं की तरफ़ इशारा कर रहा है।
उसकी आँखों में
एक अजीब-सी चमक है
जैसे पूरा आसमान
अभी-अभी
उसके सामने उतर आया हो।
वो
कभी उछलता है,
कभी ज़िद में
अपने छोटे-छोटे पाँव पटकता है—
जैसे दुनिया की
सबसे ज़रूरी चीज़
अभी वही गुब्बारा हो।
उसकी हथेलियाँ
हवा को पकड़ने की कोशिश करती हैं,
जैसे रंगों को
मुट्ठी में भर लेना चाहती हों।
और जब
आख़िरकार
उसके हाथ में
एक लाल गुब्बारा आ जाता है,
तो उसकी हँसी
इतनी उजली होती है
कि लगता है
आसमान का एक छोटा-सा टुकड़ा
सचमुच
उसकी मुट्ठी में आ गया हो।
उस पल
वो बच्चा
सिर्फ़ एक गुब्बारा नहीं पकड़ता
वो
जीवन की पहली ख़ुशी
अपनी उँगलियों में
हल्के-हल्के
थाम लेता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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