प्रेम का शाश्वत आलोक
जब प्रथम बार
तुम्हारी स्मृति ने
मेरे अंत:करण के द्वार पर दस्तक दी,
तब मैंने जाना—
प्रेम केवल एक अनुभूति नहीं,
अपितु अस्तित्व का गूढ़तम रहस्य है।
यह वह ज्वाला है
जो जलती नहीं,
किन्तु समस्त अंधकार को
मौन ही भस्म कर देती है।
यह वह सरिता है
जो बहती नहीं,
परंतु हृदय की मरुभूमि को
अमृत से आप्लावित कर देती है।
तुम्हारा होना
मेरे होने का प्रमाण नहीं,
पर तुम्हारा न होना
मेरे समस्त प्रश्नों का उत्तर बन जाता है।
प्रेम—
न शब्दों में बँधता है,
न समय की सीमाओं में ठहरता है,
वह तो अनंत का वह स्पर्श है
जो क्षण भर में
युगों की यात्रा कर आता है।
जब आत्मा
अपने समस्त आवरण त्यागकर
निर्वस्त्र सत्य के सम्मुख खड़ी होती है,
तब जो शेष रह जाता है
वही प्रेम है।
और वही तुम हो।
मुकेश ,,,
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