पत्थर और पीठ
पत्थर सबको मिले थे
बचपन से ही
कुछ ने
उन्हें खेल समझकर फेंका
कुछ ने
तुलना में तोला
कुछ ने
उन्हें अपने घर की नींव में छुपा दिया
पर
पीठ
सबको नहीं मिली
पीठ चाहिए होती है
वज़न के लिए
और वज़न
हर किसी को मंज़ूर नहीं
भीड़ के हाथ में
हमेशा पत्थर रहे
और वे
किसी न किसी पीठ की तलाश में रहे
फेंकना
उन्हें आता था
सहन करना
किसी और का काम था
जिन्हें पीठ मिली
वे
आवाज़ नहीं करते थे
बस
थोड़ा और झुक जाते थे
इतिहास
हमेशा पत्थर फेंकने वालों ने लिखा
पर
वक़्त
पीठ वालों के साथ खड़ा रहा
क्योंकि
पत्थर
एक दिन
घिस जाते हैं
पीठ
अगर टूटे नहीं
तो
पहाड़ बन जाती है
और पहाड़
पत्थर नहीं फेंकते
बस
खड़े रहते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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