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Thursday, 30 April 2026

नीरस स्त्री — कुछ और छोटी आदतें”

 नीरस स्त्री — कुछ और छोटी आदतें”


वो चाय धीरे-धीरे पीती है,

जैसे हर घूँट में

किसी अनकहे दिन को घोल रही हो।


वो मोबाइल पर कम बोलती है,

“हूँ”, “ठीक है”, “देखते हैं”—

इन्हीं तीन शब्दों में

पूरा संवाद समेट लेती है।


तुम घंटों लिखते हो उसे,

वो जवाब में

बस एक पंक्ति भेजती है—

और वही

सबसे ज़्यादा देर तक टिकती है।


वो भीड़ में

कभी आगे नहीं चलती,

हमेशा आधा कदम पीछे—

जैसे दुनिया को

थोड़ी दूरी से समझना चाहती हो।


वो तस्वीरें कम खिंचवाती है,

और जब खिंचवाती है,

तो मुस्कान भी

पूरी नहीं देती—

जैसे कुछ अपने लिए बचा लेती हो।


वो अचानक से

बात बंद कर देती है,

बिना कारण बताए—

और तुम कारण ढूँढते रहते हो,

अपने भीतर।


वो “मिस यू” नहीं कहती,

पर अगली मुलाक़ात में

तुम्हारी पसंद की किताब

चुपचाप साथ ले आती है।


वो तारीफ़ से बचती है,

और आलोचना पर

कुछ नहीं कहती—

बस

थोड़ा और शांत हो जाती है।


वो रात को जल्दी सो जाती है,

और तुम्हारे देर तक जागने पर

कोई सवाल नहीं करती—

जैसे हर किसी को

अपने अँधेरे का अधिकार हो।


वो “हम” कम बोलती है,

“मैं” भी नहीं—

बस

वाक्य अधूरे छोड़ देती है,

ताकि तुम

खुद भर सको उन्हें।


और तुम सोचते हो—

नीरस है वो,

जबकि सच यह है—

वो अपनी हर आदत में

एक गहरा संयम छुपाए बैठी है,

जिसे पढ़ना

किसी प्रेम-पत्र से

कहीं ज़्यादा कठिन है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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